Thursday, 23 February 2017

सवाल जो मुझसे नहीं पूछे गए .....

सवाल जो मुझसे नहीं पूछे गए .....

अच्छा हुआ ! मुझे किसी ने कोई पुरूस्कार से नहीं नवाजा ....|पुरूस्कार मिलता तो उस कहावत माफिक चोट लगती ,”बेटा न हो तो एक दुःख ,हो के मर जाए तो सौ दुख,और हो के निक्कमा,नकारा निकल जाए तो दुखों का अंबार नहीं” |
अपन इस आखिरी वाले बेटे की सोचें ,यदि पुरूस्कार मिला होता तो आज की परिस्तितियों में उसे वापस लौटाने की नैतिक या सामाजिक दायित्व के बोध से आत्मा में धिक्कार पैदा होती ....... लौटा ! .....लौटा ....! इस दुनिया में क्या ले के आया था ,नश्वर जहाँ से क्या ले के जाएगा .......जो सम्मान तुझे मिला था, वो तेरे अतीत के अनुभव का निचोड़ था ,आज वर्तमान में चारों ओर धर्म कुचला जा रहा है, विचारवानो की वाणी में ताले-जड़ने का उपक्रम हो रहा है ,समाज के कुलीन चेहरों पर कालिख मली जा रही है और तू है, कि तोले भर के सिक्के-नुमा पदक को  टाँगे फिर रहा है ....जिस दस बाई पन्द्रह के कांच वाले  फ्रेम में तेरे किये के, कशीदे कहे गए हैं उसमे अपनी पत्नी का फोटो जड़ दे |दीवार को साफ सुथरा रख ,आने-जाने वाले को जिस शान से उस फेम को पढवाता था उसके दिन लद गए |
    तकाजा है,जब-तक पुरूस्कार के तमगे को गले से उतार नहीं देता, गले में कुछ फांसी-जैसा चुभता महसूस  करता रहेगा |
अक्सर मुझे ये ख़्वाब आता है कि ‘अमुक जी’ के घर पत्रकार का छापा दल, टी वी वेन के साथ आ धमका  है  |
सी आई डी के खुरापाती ‘दया’ की लात से अमुक जी का कमजोर फाटक  धराशायी हुआ पडा है |अमुक जी दुबके से, सहमे हुए कोने में कंपकपा रहे हैं |अमुक जी के साथ ,सवालों की बौछार का, लाइव टेलीकास्ट किया जाने वाला  है |
“ये हैं अपने शहर के मशहूर साहित्यकार, अमुक जी ,इन्होने साहित्य जमात  में वही  मुकाम हासिल किया है, जो मुकाम शोले के भारी भरकम लेखको ने मिलकर हासिल किया था ,जी हाँ आप सलीम-जावेद का नाम कैसे भूल सकते हैं |उनकी लिखी कई पटकथाएं पुरूस्कार पाने के रिकार्ड तोड़ डाली हैं |हमारे अमुक जी इनसे कुछ मम नहीं ,इनको इतने पुरुस्कारों के बावजूद, आज आप जिस हाल में देख रहे हैं वो इनके पब्लिशर की देन है|वे इनकी रायल्टी नहीं चुकाते |कुछ इनकी रचनाओं के पूरे अधिकार मात्र चंद रुपयों में खरीदकर, भारी मुनाफा कमाए बैठे हैं |देखिये ,....हमारे अमुक जी के कमरे का पूरा ‘टांड’ पुरुस्कारों-ट्राफियों से अटा पड़ा है |मै केमरामेन को कहूंगा ज़रा इस टांड पर ज़ूम करे|
कौतूहलवश अमुक जी के घर में पहुचा ,अमुक जी , मुझे देखकर अपनी घबराहट से निजात पाए हुए दिखे |उनका मेरी तरफ देखना बिलकुल वैसा ही था जैसे पुलिस किसी निरपराध को सीखचों के हवाले कर दे तब कोई परिचित का दिख जाना यूँ लगता है की जमानत का इन्तिजाम हुआ ही समझो ...? एंकर की पैतरेबाजी शुरू हुई
अमुक जी इतने पुरुस्कारों को इकट्ठा करने में आपको कितने साल लगे ......?
मुझे पहले प्रश्न से ही एतराज हुआ मैंने इशारा किया ,वे कैमरा को ‘पाश मोड़’ में रख के घूरे, .... ये बीच में टोकने वाला कहाँ से आया ....?
अमुक जी ने परिचय करवाया ,यादव जी ! ....अपने अभिन्न पडौसी एवं मेरी रचनाओं के पहले पाठक हुआ करते हैं, लिहाजा मेरी पूरी साहित्यिक यात्रा के ये हमसफर हैं, जान लो....?बेहतर है आप  मेरे से पूछे जाने वाले सवालों का जवाब इन्ही से ले लेवे ...|आप इंट्रो में ये खुलासा करके बता दीजिये कि मै देश दुर्दशा  पर  ‘मौन-व्रत’ धारण किये हुए  हूँ |बीच-बीच में मै हामी भरता रहूंगा..... आप मुझ पर फोकस कर सकते हैं |
वे अपनी टी आर पी को तुरंत भांप कर  केल्कुलेट कर लिए और मेरे मौन का एक इंट्रो फटाफट बना डाला ...|.तो ये हैं अमुक जी ,देश की वर्त्तमान व्यवस्था से छुब्ध साहित्यकार  .....अभी मौनव्रत धारे हैं| उन्होंने लिखित में बताया कि उनके सवालों के जवाब उनके पडौसी जो उनकी साहित्यिक यात्रा  के  निकटदृष्टा हैं ,देगे ....
हाँ तो यादव जी ,ये बताइये अमुक जी साहित्य सेवा में कब से आये ....?
मैंने कहा ,यही कोई आठ-दस  बरस की उम्र रही  होगी ....दरअसल जिस पाठशाला में हम लोग पढ़ा करते थे अमुक जी हमसे दो दर्जा आगे थे |तब पाठशालाओं में गणेशोत्स्व होता था |गुरुजी अपनी स्क्रिप्ट पर नाटक खिलवाते थे |अपने अमुक जी उनकी चार लाइनों पर एक दो अपनी घुसेड देते थे |अच्छी होने पर माट सा लोग, कुछ नही बोल पाते थे |प्रोत्सान मिलते गया |दसवीं  क्लास में उनको किसी समाजी संगठन द्वारा,अंतर-स्कूली,  निबन्ध प्रतियोगिता में दूसरा स्थान मिला |तब से वे निरंतर अनवरत साहित्यिक झुकाव वाले हो गए |शहर की काव्य गोष्ठियां ,कविसम्मेलन सब में छाए रहने लगे |
क्या उन्होंने आजीविका के लिए कोई नौकरी वगैरा की .....?
जहाँ तक मेरी जानकारी है, वे एक प्राइवेट  कालेज में लाइब्रेरी में ‘बुक लिफ्टर’ बतौर रख लिए गए |वहां उन्हें एक फ़ायदा यह हुआ कि लाइब्रेरी की तमाम साहित्यिक पुस्तको को पढ़ डाला |प्रमचंद ,मुक्तिबोध,निराला ,प्रसाद ,चतुरसेन शास्त्री ,विमलमित्र आदि नामी लेखको की छाप उनके मानस-पटल पर अंकित होते गई .....|
उनके लिखने के अंदाज में, दिनों-दिन निखार आते गया |तभी कालेज की लाइब्रेरी छात्र हिसा की शिकार हुई, और आग के हवाले कर दी गई|यूँ उनके आर्थिक पहलू का सहारा-समापन हो गया |उनके पास ऊँची कोई डिग्री नहीं थी लिहाजा अन्य काम न मिल पाया ,मगर उनके लिखने में कमी नहीं आई वे लिखते रहे और समान पुरूस्कार पाते रहे |स्तिथी यूँ भी हुई कि कभी कालिज का पढाई के नाम पर  मुह नहीं देखे,पर उनके लिखे को कोर्स बुक में रखा जाने लगा |
एंकर , क्या आज वे अपने सम्मान या मै कहूंगा सम्मानों को लौटाने का कदम ,जैसा की अन्य ख्यातिनाम साहित्यकार उठा रहे हैं,अमुक जी भी  उठाएंगे .....?
देखिये पुरूस्कार के नाम पर जो भी उनको देय राशि मिली थी, एक भी न बची |यहाँ गुजर-बसर के लाले पड़े रहते हैं |कभी-कभी, मै जब दौरे पर चल देता हूँ, तो कहना अच्छा नहीं होगा ,इनके खाने के भी  लाले पड जाते हैं|मैंने अमुक जी से इस बाबत बहुत ही अंतर्मुखी जीव पाया है ,वे खुल के अपने साहित्य के सिवा और कहीं मुखरित नहीं होते |मैंने प्रसंगवश    पिछले हप्ते,इसी बात की  चर्चा की थी| वे बोले थे , ये सब मेरे किस काम के हैं....? रद्दी में बेचूं तो भी हफ्ते भर का राशन नहीं आ पायेगा ,जिसे जहाँ लौटाना हो लौटा दो .मेरे पास  तो इन्हें ले जाकर कहीं देने या लौटाने के लिए ऑटो लायक पैसे भी नहीं ....देख लो ....
इत्तिफाकन आज आप लोग आ गए .....|मै अमुक जी का मुख्त्यार, आपको उन्ही के सामने, ये टांड भर, रखा पुरूस्कार वापस लौटाता हूँ ...अमुक जी ने अपनी सहमती में गर्दन झुला कर हामी कह दी |कैमरा ज़ूम हो के कभी अमुक जी की हामी में झूलती गर्दन दिखाता तो भी पुरुस्कारों से भरे हुए  टांड .की तरफ चल देता ....
मै चाहता था, एंकर मुझसे निजी तौर पर  पूछता ....आपने अमुक जी इतनी सेवा की ....आप अमुक जी की मुफलिसी को, साहित्य बिरादरी में प्रचारित करके, उनकी सहायता के  लिए कुछ किया क्यों नहीं ....?
मै ये कहने वाला होता कि अमुक जी अपने संकोच को, अपनी असुविधा को, अपनी फटेहाली को जीना बर्दाश्त कर लेते हैं वे सहायता के नाम पर असहाय हो के  मागते हुए दिखना नहीं चाहते ....?उनकी खुद्दारी है की अगर उसकी कलम में कभी ताकत रही होगी तो शासन उसे स्वयं आँक के मेरे पास आयेगा ...|
वे अक्सर ,मेरी अकिचंन से भेट या चढावे को , कभी संकोच या कभी उलाहना के साथ ग्रहण करते रहे हैं |
सर्दी में  ठिठुरते,गरमी में झुलसते ,बरसात में, चुहते हुए कोठारी में, इस कोने से उस कोने भीगते हुए उसे करीब से मैंने देखा है |कागज़ का कोई कोरा पुर्जा थमा दो वे अविस्मर्णीय कोई चीज लिख कर रख देते हैं|  
उनके जैसे बुद्दिजीवी का क्षरण,सहनशील आदमी का ह्रास या निरपेक्ष जीव का  तिल-तिल मौत के मुह की ओर  समाज के द्वारा  धकेला जाना,या उपेक्षित किया जाना  मुझसे कतई बर्दाश्त नहीं होता |                      
सुशील यादव


पत्नी की मिडिल क्लास ,’मंगल-परीक्षा’


पत्नी की मिडिल क्लास ,’मंगल-परीक्षा’

आफिस से लौट कर जूते-मोज़े,खोलते हुए बेटर-हाफ को आवाज लगाया ,सुनती हो ......?
ये नासपिटो (नासा के पिटे हुए) ने हमारा सलेक्शन मंगल-ग्रह  जाने के अभियान में कर लिया है |इसरो -बॉस ने हमें खुशखबरी सुनाते हुए मुबारकबाद दिया है ....|
      पहले तो बीबी गर्व से साराबोर हुई ....|फिर आर्ट-विषय से एम. ए. पास के भेजे में, भूगोल और साइंस की मिली-जुली खिचडी, पक कर, कूकर-वाली लंबी सीटी बजी, तो यकायक ख्याल आया ,ये मंगल-गढ़ की बोल रहे हैं क्या .....?
उनने फिर स-अवाक पूछा.... क्या कहा ,,,,,मंगल-ग्रह यानी अन्तरिक्ष वाला ......?  जाना है.....?
ये, अपने टीकमगढ़ से तो, करोडो मील की दूरी पर है, बतावे हैं ....?
हाँ ...करोड़ों मील दूर..... बिलकुल सही सुना है |लाखों की स्पीड वाला शटल भी, साल-भर में पहुचाता है |
तो बताओ आप  ही को, काहे भेज रहे हैं ,आपसे ज्यादा पढ़े-लिखे,होशियार  सक्सेना जी ,श्रीवास्तव जी को कहे नहीं भेज रहे .......?
मैंने कहा, पगली उन लोगों का फील्ड अलग है| वे लोग पर्चेस में हैं ,श्रीवास्तव जी एकाउंट सम्हालते हैं ,वे लोग क्या करेंगे .... क्या कहती  हो वो तुम्हारे  मंगल गढ़ में?
तो आप कौन से खेत में  मूली बोने जा रहे  हैं ....?नासा वालो को ,आप जैसे भुल्लकड की क्या  दरकार पड गई .?
हम वहां ‘एनालिस्ट’ हैं.....|.एनालिस्ट माने..... तुम्हे क्या समझाएं ...?.समझो हम लिक्विड-चीज में क्या- क्या, मिला-घुला है, इसकी जाँच करके बताते  हैं ?
आप क्या जाँच करते होगे.....हमें शक होता है कोई आपकी कहे को मानते भी होंगे ....? हम जो फिछले   दो माह से,दूधवाले को समझने समझाने की कह रहे हिन् उस पर तो जूं  नहीं रेंगती , दूधवाला निपट पानी जैसा दूध  दे के पूरे पैसे गिनवा ले जाता है |उसकी जाँच कभी आफिस में कर आते कि नहीं  .....?
खैर छोड़ो.... मंगल गढ़ में क्या जंचवाना है, नाश पीटो को......
मैंने कहा ,तुम टाइम निकाल के, टी वी में सास बहु सीरियल के अलावा और कुछ भी देख लिया करो| ....कई दिनों से वे  चिल्ला चिल्ला के बखान रहे हैं ....मंगल-ग्रह में पानी की खोज कर ली गई है|ये नासा वाले उसी पानी को,इस धरती में लाकर यहाँ जाँच-वाच करना चाहते हैं |वहां के पानी में, और यहाँ के पानी में क्या क्या समानता और असमानताये  हैं ?    
देखो उधर जा रहे हो तो, अपने घर के लिए भी एक ‘कुप्पी’ रख लेना |एक-एक चम्मच प्रसाद जैसे, मोहल्ले में और किटी वाली जतालाऊ औरतों में  बाट दूंगी....?
क्या मतलब ....?
वैसे ही,जैसे लोग ‘गंगा-जी’ जाते हैं, तो अडौस-पडौस वाले बाटल में अपने लिए गंगाजल की फरमाइश कर देते हैं  ....|
पगली !तुमने  नासा-इसरो वालों को घास छिलने वाले घसियारों की केटेगरी में समझ रखा है ....?बहुत हुआ तो हम चोरी-छिपे, पेन के इंक को, उधर फेक के  थोड़ा-बहुत तुम्हारे प्यार की खातिर ला सकेंगे ज्यादा की मत सोचना |आगे-पीछे सब देखना पड़ता है .... सी सी टी वी की जद में चौबीस घंटे रहना पड़ता है ,समझी .... |
लौकी,सेम-वेम के बीज तो, छोड़ के  आ सकते हो......मंगल में बसने वाली पीढियां अपने बच्चो को कहेगी कि ये लौकी जो देख रहे हो साकू के पापा सालों पहले अपने साथ लाये थे ...?
ना ...... वो भी नहीं....?फिर वहां  पानी मिलाने का क्या फ़ायदा
हमने समझा पानी मिल गया है तो फसलें  भी उगेगी |
आपके दीगर जरूरत की चीजों  का बंदोबस्त भी करना होगा ,आप तो एक चड्डी भी धो निचोड़ नही सकते पता नहीं उधर कैसे मेनेज करेंगे ....?कल से बैगेज तैय्यार करने में भिड़ती हूँ ...?कब जाना है ..आखिर ...?
चार छ: सेट ,कच्छा, बनियान, टाई,मोज़े सब नये लेने पड़ेंगे |घिसे-घिसे को चलाए जा रहे हैं ....?दो तीन जोडी शर्ट-पेंट भी कल माल से ले लेंगे| अभी उधर,  फिफ्टी पर्सेट आफ का आफर चल रहा है |
मैंने कहा आराम से ,.....वे लोग तैय्यारी के लिए हप्ते भर का टाइम देते हैं|
आपको मठरी-खुर्मी बहुत पसंद है ,कल से जितना ले जाना है ,बनाए देती हूँ ...|
मैंने जोर देकर कहा वे लोग ये सब कुछ अलाऊ नहीं करते....|सब दस्त बीन में दाल देंगे ....?और हाँ .... वहा बाहर कहीं किसी को कुछ दिखाने का नहीं, बरमुडा ही काफी रहता है |हाँ ठंडी बहुत रहती है ..मगर .वे लोग उसका भी इन्तिजाम कर रखे होते हैं तुम्हे चिंता करने की जरूरत नहीं |
वैसे डार्लिंग ! ये मेरा पहला टूर होगा जहाँ से तुम अपने लिए कुछ भी नहीं मंगवा  सकती .....?
आप बीबी लोगों को नहीं जानते ....हम कुछ भी मंगवा सकती हैं ...|.कम से कम एकाध पत्थर, एडी घिसने ले लिए तो लेते ही आना|बड़े फक्र से किटी-बहनों को बता सकूंगी की मंगलग्रह  के पत्थर से अपना रूप-रंग निखारती हूँ |
देखो अब, हप्ते  दो हप्ते  का मेहमान हूँ तुम्हारा ...!
.जी भर के खिलाओ-पिलाओ,प्यार-व्यार कर लो ..?
वो सकते में आ गई ...कैसी अशुभ बाते कहते हैं .....?बताओ वापस कब तक आना होगा ....?
शायद साल भर तो जाने का ही लगता है अब सोच लो ....
तो फिर आपको मै जाने नहीं दूगी ....भाड में जाए ऐसी नौकरी .....|पत्नी का भूगोल ज्ञान में अचानक भूकंप सा आने लगा जो धीरे-धीरे, सात-आठ डेसीबल की तरफ बढ़ने लगा |
बड़े साइंटिस्ट बने फिरते हैं नासा वाले, नाश पिटे ! मशीन काहे नहीं बना सकते ....?इतनी बड़ी-बड़ी खोज किया करते हैं ,एक  छोटी सी ‘पानी-जांच मशीन’ बनाने के लिए कंजूसी क्यों कर रहे हैं .....?उनको  हमारा ही मर्द दिखा.... जो आर्डर फार्मा रहे हैं ...?
और मै पूछती हूँ तुम कैसे मर्द हो जी ......?जो कोई भी आदेश पा के खुशी-खुशी चहकते घर में आकर उंची नाक करके अपनी बीबी को बहादुरी के किस्से बखान कर रहे हो ....?
 मै कल सुबह ही, ‘झा अंकल’ से कहके आपके इसरो  आर्डर को केसिल करवाने के लिए पी एम से बात करने को कहूंगी |अपने सांसद आड़े समय में काम न आये तो क्या फ़ायदा .....?मै तुम्हे किसी कीमत में मंगल ग्रह में जाने नहीं दूगी |
 मुझे  अनजाने ही अपनी बेटर हाफ का, बेटर वाला, यानी  सती-सावित्री रूप का साक्षात दर्शन हो गया  |
चुपचाप शर्ट की उपरी जेब से कोई बिल नुमा कागज़ निकाल के ........टुकडे-टुकड़े  कर दिया और कहा लो ,मेरा जाना केंसिल ......|
इसरो बॉस को समझो  मै कल मना लूंगा |हाँ नासा वालों का हर प्रोग्राम बेहद टॉप सीक्रेट होता है अडौस-पडौस में मेरे दौरे की चर्चा नहीं  करना वरना लेने के देने पड सकते हैं ......
वो लजाते हुए बोली मुझे आप एकदम भोली समझे हैं क्या ....इतना दिमाग तो कम से कम है ही ....?
मै मुस्कुरा दिया ....
मुझे लगा इस फर्जी  एहसान तले, मेडम ‘सावित्री’ को लाकर कम से कम कुछ दिनों  के लिए अच्छा खाने- पीने और मस्ती का लाईट इन्तिजाम बखूबी  कर लिया |
सुशील यादव
मन चंगा तो .....
एक बार संत रैदास के पास उसका दुखी मित्र आया,कहने लगा आज गंगा में स्नान करते समय उसका सोने की अंगूठी  गिर गई |लाख ढूढने पर मिल नहीं सकी |संत रैदास ने पास में रखे कठौते  (काष्ट के बड़े भगोने, जिसमे चमड़े को भिगो कर काम किया जाता था ) को उठा लाये , उसमे पानी भरा और अपने आगन्तुक मित्र से बोला ,चलो अपने हाथ को  डुबाओ |मित्र की अंगूठी उस कठौते में थोड़ी देर हाथ घुमाने पर  मिल गई |अब ये चमत्कार संत का था, कठौते का था,या चंगे मन का था, कहा नहीं जा सकता मगर तब से, ये कहावत जारी है “मन चंगा तो कठौते में गंगा”
आदमी के मन में अगर कहीं  खोट नहीं है,असीमित आत्मसंतोष है, तो सीमित साधनों में भी उसे सब कुछ उपलब्ध हो सकता है |पाप धोने के लिए गंगा जाना जरुरी है, ये हिन्दू के अलावा किसी दूसरे मजहब में प्रचारित नहीं दीख पड़ती |
कठौते  से, गंगा में  खोए  सोने  का मिल जाना वास्तविकता के आसपास यूँ भी हो सकता है कि, संत-सखा को  सोने से ज्यादा कीमती, रैदास के उपदेश लगे हों .....?वो उसी पे संतोष कर लौट गया हो .......पता नहीं......?
           कई बार यूँ भी होता है की हम जिस चीज को गंवा बैठते हैं उससे ज्यादा हमें उस पर  बोल-वचन सुनने को मिल जाते हैं |जो चला गया...... वापस कब आता है....?’आत्मा’ या ‘चीज’ के संबंध में सामान रूप से लागू हो जाता है |आदमी अपने धैर्य को मर्यादा में रहने की सीख यहीं से देना शुरू कर देता है |
सब्र की बाँध को टूटने से बचाने के लिए जरुरी है हम किसी संत की शरण में यदा-कदा झांक लें|
शहर के ,’मर्यादा- बार’ में अपने बगल की टेबल से पहले पेग का प्रवचन, एक इकानामिस्ट चतुर्वेदी की  तरफ से जारी था |बगल में तीन चार नव-सिखिया,बिल्डर,वकील,नेता लेखक जमे बैठे थे |अपना उनसे केजुअल हाय-हेलो जैसा था|आमने-सामने पीने- पिलाने में दोनों पार्टी को कोई परहेज नहीं था |
वे दूसरे पेग में देश की सोचने पे उतारू हो गए |यार इस दिल्ली को बचाओ .....?
मफलर भाई क्या चाहता है आखिर ....?
दिल्ली के ‘कठौते’ पर काबिज हो गया है |
पूरी दिल्ली खंगाल लिया ,पता नहीं इनका क्या खोया है जो मिल नहीं रहा .....?
बेचारी जनता ने ६७ रत्नों से  जडित कुर्सी से दी, इतनी इनायत कभी किसी पर नहीं की ....?
जनाब और दिखाओ ....और दिखाओ की रटी  लगाए बैठे हैं.......?बिल्डर ने सिप लेते हुए कहा, .....है खुछ और दिखाने को नेता जी ,क्या कहते हो ....?
नेता ने, ‘बाबा जी का ठुल्लू’ वाला मुह बना कर, अपने ‘चखने’ पर बिजी हो गये |
वकील ने इकानामिस्ट से पूछा ,ये एल जी और केंद्र से काहे टकरा रहे हैं ......?
जनता से जो वादा किये उधर धियान काहे नहीं दे रहे बताव ....?
इकानामिस्ट ने अपनी बुजुर्गियत झाड़ते हुए कहा ,तुम लोगों को पालिटिक्स अभी सीखनी पड़ेगी |जनता से वादे निभाने के अपने दिन अलग से  आते हैं|ये नहीं कि वादों के एजेंडे वाली कापी, शुरू-दिन से खोल बैठें |तुम लोगों ने एक्जाम तो खूब दिए होंगे,जुलाई से कभी पढने बैठ जाते थे क्या ....,?पढाई की तैय्यारी तभी होती है न .... जब एक्जाम के डेट सामने आ जाएँ |ये लोग भी तब कर लेगे|
ये लोग और किस पावर की बात कर रहे हैं .....?ट्रांसफर ,पोस्टिंग ,पुलिस पर कंट्रोल .....?लेखक ने सोचा तीसरी लेने के पहले उसे कुछ कह लेना चाहिए,वो जानता है....,दमदार वार्ता उसी की रहने वाली है ....|वो प्रबुद्ध है .....पिए-बिन पिए हरदम  निचोड़ वाली बात कहता है ....
भाई सा ....देखो ये ‘पावर’ ‘कुत्ती’ चीज है,कुत्ती समझते हैं ना .... अच्छे-अच्छो का दिमाग खराब कर देती है|चुन के आ गए ,रुतबा नहीं है .....क्या ख़ाक कर लेंगे .....?
लेखक द्वारा भाई सा, को ‘भैसा’ बनाने में,दो ढाई पेग की ‘लिमिटेड’ जरूरत होती है|हाँ तो मैं क्या कह रहा था ‘भैसा’.... पावर न हो तो क्या अंडे छिल्वाओगे .....६७ लोगो के लीडर से ?
दो ,इनको भी मौक़ा ,करें ट्रांसफर ,बिठाए अपना आदमी ........’जरिया’ खुलने का ‘नजरिया’ साफ जब तक नहीं दिखेगा  ये खंभा नोच डालेंगे  ....?
ओय ,राइटर महराज ,ये ‘जरिया’ ,’नजरिया’ क्या लगा रखा है ,तू खुल के बोल नहीं पा रहा है आखिर चाहता क्या है बोलना ....,बिल्डर बोतल उसकी गिलास के मुहाने रख देता है .......|अरे यार मरवाओगे क्या ....चढ़ जायेगी .....|
चढती है तो चढ़ जाने दो राइटर जी ,पीने का मजा ही क्या, जब दिल की बात दिल में रह जाए ......?बोल क्या जरिया चाहिए ,ट्रांसफर ,पोस्टिंग ,पोलिस दहशत ....क्या लेगा दिल्ली के लिए ....?वे दिल्ली के मास्टर-प्लान बनाने में जुटे थे ......
मुझे लगा  ,इनकी बातों का कुतुबमीनार अब-तब  कहीं मुझ पर जोरो से न आन गिरे ....|
..मैं वेटर को आवाज देता हूँ ,ऐ सुनो .....बिल ले आओ फटाफट  ......
.न जाने बियर मुझे एकाएक कसैला क्यों लगने लगा ......|              
                सुशील यादव

दृष्टिकोण चांगला पाहिजे .....

दृष्टिकोण चांगला पाहिजे .....

वे प्रबुद्ध हैं |उन्हें देश की चिंता रहती है|
वैसे आजकल प्रबुद्ध कहाने का शार्टकट भी यही है कि, एक स्वस्थ आदमी देश के बारे में  सोचें |
वैसे तो पर्यावरण वाले भी देश के मौसम ,मिजाज ,हरारत ,सर्दी की दिनरात सोचते रहते हैं,अनुमान लगाते रहते हैं , मगर उन्हें प्रबुद्ध की  श्रेणी में इसलिए नहीं रख सकते कि वे ‘पेड़’ इम्प्लाई हैं |इसकी, नजर-खबर रखने की , वे तनखा पाते हैं |
बिना तनखा कमाए, जो देश की सोचे सो प्रबुद्ध .....|
पुराने जमाने में जनहित की सोच रखने वाले विरले मिलते थे |मगर जो मिलते थे वो एकदम सॉलिड .....|आंधी-तूफान से टक्कर लेने वाले......|
वे अधिक माथा-पच्ची नहीं करते थे |उनका ‘सब्जेक्ट- टार्गेट’ आजादी के इर्द-गिर्द घूमता था |उन  महान लोगों को इस लेख परिधि से अलग रखते हुए, श्रधा सुमन अर्पित है |
अब आइये ,आजकल के चिंतन-मनन करने वालों की तरफ रुख करें |
इनकी तादात देखते-देखते इन दिनों करोड़ों से ऊपर की हो गई है|इनकी आबादी  दिनों दिन बढ़ने-बढाने के पीछे, शोध पर पाया गया की ये सब मीडिया की नई उपज हैं |वार्तालाप की मंडी में, जगह-जगह उतर रहे हैं |
मार्निग वाक् वाले बुजुर्ग ,धोबी ,नाइ ,मोची ,ड्राइवर ,भिस्ती ,बावर्ची सभी करंट राजनीति के विश्लेषक बन गए हैं |
 सरकारी मुहकमो में, एक चौथाई समय सरकार के कार्यकलापो और पिछली रात, इडियट बाक्स में दिखाए छम्मक छल्लो माँ ,कथित हत्यारिन  माँ ,और पी एम ,सी एम संवाद में निकल जाता है |
जिसके पास बखान करने का ज्यादा मसाला होता है उसकी दिन भर के चाय-समोसे का इन्तिजाम पक्का हो जाता है |प्रवचन सुनाने वाला,श्रोता जमात और जजमान को देखकर  गदगद रहता है |पूरे स्टाफ में प्रबुद्ध का खिताब धारी होना अलग मायने रखता है |  
कुछ वे लोग भी हैं जो ,देश में गिरती अर्थ व्यवस्था पर मनन कर अपना वजन घटाए रहते हैं  |सेंसेक्स नीचे चला जाता है तो रात भर बेचारे सो नहीं पाते|बच्ची,लड़की या बुजुर्ग महिला पर अमानुष कृत्य हो जाए तो खुद को अपराधी महसूस करते हैं |
झासा देकर कोई राजनीतिक दल मतदाताओं से वोट ऐठ लेता है, तो लुटा हुआ महसूस करते हैं |
भ्रस्टाचार उन्मूलन की मुहीम में उन्हें  सबसे आगे रहने वाले जीव होने का दावा करते देखा जा सकता  हैं |
वे महज निगेटिव सोच पालते तो, मुहाल्ले पडौस से उखड़ गए होते |उन्हें समय सापेक्ष पाला बदलने का भी खासा तजुर्बा रहता है |उनके किसी  क्रियाकलापों से आप कांग्रेसी या संघी की मुहर नहीं लगा सकते |सफाई अभियान की बात हो तो चार झाड़ू के पैसे अपनी जेब से ढीली कर देते हैं |कलफदार कुरते-पैजामे में उनको देक्खकर लगता है, पूरे दिन की सफाई का श्रेय वही लूट ले जायेंगे |’आप’ की सीट दिल्ली में बढती है तो बाछे खिल जाती है |उन्हें प्रजातंत्र का अवतार पुरुष कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी |
उनका मत है कि,कोई प्रबुद्ध हो और देश के प्रति चिंता न रखे, ऐसे प्रबुद्धों को लानत है|वे दिन में ‘अमरवाणी’ बनाने लायक कई सूक्ति वाक्य बोल चुके होते हैं ,उनको मलाल रहता है कि कोई इन्हें नोट करने वाला आसपास नहीं रहता |
उनकी ‘चिंतामणी’ छवि मोहल्ला पड़ोस के स्तर पर भी गौर करने लायक है|किसी की भैस गुम जाए तो बाकायदा पडौस के गाव तक खोजने निकल पड़ते हैं,वहां के पञ्च सरपंच को आगाह करना ,इत्तिला देना पहली फुरसत का काम जानते हैं|बदले में उधर, चाय ,और राजनीतिक घुसपैठ की गुजाइश पैदा हो जाती है |
किसी परिचित की, कम दूध देती गाय का इलाज जब तक किसी वेटनरी डाक्टर से न करवा दे,वे अघोषित, अन्न जल त्यागे की श्रेणी में होते हैं |
वे अखबार में छपी, छोटी-छोटी खबरों से भी चिंता उठा लेते हैं|इसे उनका अखबार प्रेम कहें ,निठल्लापन कहे,काम-काजी बेटे-बहुओं द्वारा उपेक्षित बुढापा कहें या देश के प्रति बुझते दिए की टिमटिमाहट कहे ....?समझ नहीं आता ....बहरहाल वे छोटी-छोटी चिंताओं को लिए मन ही मन तलवार भांजते रहते हैं | कोफ्त में दीखते हैं .....|
मैंने एक दिन उनसे यू ही पूछ लिया ,ताऊ जी ये मोहल्ले भर का झमेला क्यूँ लिए रहते हैं ?
वे बोले ,सुकून मिलता है|दिल से बोझ उतरा हुआ सा महसूस होता है |
अगर मुहल्ले की न सोचूं तो देश हाबी हो जाता है ,और तुम तो जानते हो देश के बारे में इन दिनों सोचना कितना भयंकर सा काम है |अच्छा खासा आदमी अनिद्रा-रोगी  बन जाए ...?
ताऊ जी को नये-नये हाबी बदलते भी देखा गया है|उसे ब्यान करने में लगता है की वे सठियाने लग गये हैं |एक दिन मार्निग वाक् के दौरान देखा कि गय्या की रस्सी पकड़े आ रहे हैं ...?हमने पूछा सुबह सुबह गौ माता को कहा लिए जा रहे हैं ....?वेटनरी अस्पताल तो अभी खुला न होगा |वे संजीदा हो के मेरी तरफ देखे ......तुम लोगों की नजर संकीर्ण क्यों हो गई है,वो जो सामने श्रीवास्तव जी अपने कुत्ते का पट्टा पकड़े हैं उन्हें माडर्न समझोगे ,हम जो अपनी गाय को चराने निकल गये तो आफत आन पड़ी ....?
मुझे बगले झाकने, और जल्दी खिसक लेने में एकबारगी बुद्धिमानी लगी |मेरे कदम वाक् से जागिग केटेगरी के कब हो गए ,पता न चला |  
वे हाई-बी-पी  वाले डिटेक्ट हो गए हैं ,उनके हित में डाक्टरों ने अनर्गल टी वी में  प्रसारित समाचारों और आजकल दिखाए जा रहे बेकार की मुद्दों पर बहस से बचने की सख्त हिदायत दे रखी है |
वे मानने वालो में से हों मुझे नहीं लगता ......?
सुशील यादव

ज़रा मन की किवडिया खोल ......


ज़रा मन की किवडिया खोल ......

आप फेल तो हुए होंगे ,रायचन्दों का तांता लग जाता है |गलतियां गिनाने वाले हर गली मोहल्ले में रोक रोक के अपनी राय जाहिर करते हैं |  पीठ पीछे वाले भी होते हैं, जो आपको छोड़ते नहीं |वे जनमत में यह फैलाते हैं की काश वे आपकी माने होते तो ये दुर्दिन देखने की नौबत उन्हें आई नहीं होती |
क्या कहूँ  !
इन्हीं रायचन्दों में से मै भी एक हूँ |
बन्दा हाड माँस का जीव है और खुदा के रहमो करम  ने,  इसे  दिल दिमाग से भी नवाज दिया  है |ये  दैनिक अखबार और मीडिया में चकल्लस रूपी बकवास प्रसारण में, चार लोगों की  चौपाल वाली किच  किच भी सुन लेता है ,अत: इसे चुनाव का व्यवहारिक ज्ञान हो गया है |
यूँ कहे, जनता की नब्ज टटोलने की चुनावी बीमारी सी लग गई है |
वैसे  तो रिजल्ट आने के बाद हर कोई एक्सपर्ट ओपिनियन के तहत यह बताने से नहीं चुकता की हमने तो पहले  ही  कहा था.............,वे माने ही नहीं ,वरना परिणाम दूसरा होता |
खैर ! बीत गई सो बात गई ,यानी बीती ताहि बिसार दे,आगे की सुधि लेय.....|एक ट्रेन छूटने का गम न कर यहाँ हर घंटे में तेरे ‘मकसद गाव’ की ओर एक ट्रेन जाने को  है |बस तू टिकट कटाए रख ,लपक के अगली में घुसने की कोशिश कर |बच्चा ,कामयाबी जरुर मिलेगी |
    इतना जान ,अगली ट्रेन जो लगने वाली है ,वो धार्मिक यात्रा वालों की सात्विक ट्रेन  है|
मुसाफिर भोले भाले हैं |
इनसे किसी भी प्रकार से असात्विक बातें न कर |मांस मटन से ये कोसों दूर रहते हैं |इन्हें लौटती ट्रेन का आरक्षण जरुर मिले,यह  व्यवस्था  कर  , ये भगवान से तेरे लिए दुआ मांगेंगे |किसी स्टेशन में इनको चाय पिला के देख, भूखी जनता ,और परेशान पेसेंजर ज्यादा न मिले तो थोड़े से संतोष कर लेने के आदी पाए जाते हैं |
इस ट्रेन में मागने वाले गवईए,फेरी वाले,डुप्लीकेट माल  बेचने वाले जगह जगह से चढ़ेंगे |इनकी सच्ची पहचान मुसाफिरों से करवा के, वाहवाही लूट |ये उघते हुए मुसाफिर, जिस जगह जाग गए ,तुझे शुभकामनाओं से साराबोर कर देंगे |
तुम इस डिब्बे में खिडकी के पास बैठे , उन्तालिस्वे नम्बर के बर्थ वाले, “तत्व ग्यानी” महाराज से नहीं टकराए, वरना वो ललाट देख कर ही बता दिए होते कि तुम आगामी चुनाव में अपनी पार्टी के प्रचारक की हैसियत से जगह जगह सैकड़ों   भाषण सभाएं करोगे |तुम्हारी वाणी से एक ओर करोड़ों  के दान की घोषणाएं होंगी तो दूसरी तरफ तुम्हारी जिव्हा से, मजहबी  दंगा फसाद में मारे गए व्यक्ति के विषय में एक भी शब्द कई दिनों तक नहीं निकलेगा|
तुम गौ माता के सेवक बतौर अच्छे हो मगर इसे “फायदे की माता” समझना भूल होगी |तुम्हारी ‘महंगी दाल’ गलाने वाला आदमी तुमको ढूढने से भी नहीं मिलेगा |तुम कितना भी प्रेशर लगाओ ,कुकर की सीटी तो बोलेगी मगर अच्छा व्यंजन परोस नहीं पाओगे|
तुममे अहंकार की जो चिगारी थी, वो अब ज्वाला बन गई है |उसे ज्वालामुखी बनने से पेश्तर, तुरंत रोको |
अपने ढहते घर को सम्हालो, फिर दूसरों के रंग रोगन दीवाली को देखने बाहर निकालो|ग़रीबों के पैसों को बाहर लुटाने की बजाये, मरते किसानों को ढूढ़ निकालने वालों पर इनाम की घोषणा करो  |
आर्थिक उपलब्धियां  गिनाने की बजाय,उपजाऊ जमीन में आ रही गिरावट की समीक्षा हो |मेक इन इंडिया की जगह ग्रो इन इंडिया के लिए विदेशी मजदूर बुलवाओ, क्योकि एक रुपये में अनाज बाँट कर, आपने सभी मजदूरों को काम के लिए  अपंग निक्कम्मा कर दिया है |  
प्रचारक भाई ! खोल सको तो “मन की किवडिया” खोलो ,देर अभी भी नहीं हुई है |
  सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग (छ.ग.)
susyadav7@gmail.com  ०९४०८८०७४२०

आओ बच्चो तुम्हे दिखायें......


आओ बच्चो तुम्हे दिखायें......

इस धर्मनिरपेक्ष देश के बूढ़े-अधबूढ़े बच्चो,
टी वी के, घटिया न्यूज से सठियाये बुजुर्गो ,
सास-बहू सीरियल से, घबराई माओं,बुआओ ,बहनों.....
कभी तफरी का जी करता होगा ....?
बेटे-बहू आपकी बुजुर्गियत पर पीठ-पीछे तंज कसते होंगे| आपको जानकार, जाने कैसा लगता हो .... |
आपके हलके-फुल्के टाइम-पास का, ‘पाप-कॉर्न’(पाप का कारण ) चलो ढूढ़ते हैं |
सबसे पहले ‘बच्चो’ ,ये बताना मेरा नैतिक धर्म बनता है कि आप अपनी परसी हुई थाली को गौर से देखें |ज्यादा चिकनाई तो नहीं है ....?चिकनाई सेहत के लिए हानिकर होता है |आपकी रोटी में घी मख्खन चुपड़े होने का  सीधा-सीधा मतलब, कहीं आपके पेंशन को दान में मागे जाने की तय्यारी तो नहीं हो रही है |
बेटा या बहु का ड्रामा , आपके पोते-पोतियों के भविष्य’,या उनकी अच्छी शिक्षा का वास्ता देकर ,इस खजाने से आपको वंचित करने का, प्लान तो नहीं बना रहे हैं |या हो सकता है आपके फिक्स्ड डिपाजिट एकाउंट से कोई बड़ा अमाउंट हथियाने के चक्कर या फिराक में वे सेंध लगाने के चक्कर में  हों |  
यूँ, सुनने में बहुत अच्छा लगता है ,बाबूजी ,ये अपना  मकान है न ,जर्जर ,खंडहर सा हो रहा है ,इस इलाके में अभी कीमत अच्छी मिल रही है |हो सकता है कल मेट्रो या सड़क चौडीकरण में अपना मकान फंस जाए , फिर तो इसके औने-पौने दाम ही मिलेंगे क्यूँ न इसे फटाफट निकालकर, सिविल लैंन  की तरफ, फ्लेट ले लिया जाए ,यही आज के समय की  अक्लमंदी  हैं |वे आपको ,’कन्फयुज्ड’ करके रख देंगे |कहाँ आप बाड़े-नुमा, हवेली माफिक मकान के स्वामी, और कहाँ ‘थ्री बी एच के’ का दंदकता, कुंद सा मुर्गी खाना ....? वे अपने सुझाव के पक्ष में ,चार  यार-दोस्तों का हवाला देते हैं कि कैसे सस्ते में सब लोग फ्लेट एप्रोच लगा-लगा के ‘कबाड़’ रहे हैं|अगर अभी चुक गए तो  आने वाले दिनों में जिनके दाम निशित आसमा छूने वाले होगे |और आने वाली सात पीढियां पानी पी-पी के अपन को  कोसेगी .....कहाँ  दादा जी की ‘मति’ मारी गई थी |आपका ‘ब्रेनवाश’ बिना डिटर्जेंट के होने से, अब भगवान रोक्के तो रोके ....|वरना ,इस उम्र में सरेंडर करने का पहाला पाठ यहीं से शुरू हो जाता है |
अगर आपके पास इस कान से सुनो और दूसरी से निकाल दो की ‘प्रेकटीस’ तगड़ी  है, जैसा अपनी पत्नी के साथ अमूमन करते रहे हैं ,तब तो आप उस मकान में बरसो टिके रह सकते हैं वरना लालच और दबाव के आगे आपको अपनी मर्जी के खिलाप घुटने टेकना ही पड़ेगा |
आपने, अपने सरकारी ओहदे में कितने फरमान जारी किये होगे ...कितनो का अनुपालंन होते पाया होगा |जिसने फरमान के माफिक नही किया उसके ‘ऐ सी आर’ ,रंगे होगे ,वे तब के दिन थे |हो सकता है कई मातहत घुटने टेकने को भी बाध्य हुए हों ,मगर वो सब आपका सरकारी रुतबा ,दबदबा था ,अब इन सब की कहीं पूछ नहीं | इन सरकारी ‘ठाठ के दिनों को’ गमछे में लपेट के कहीं बाहर टांग दो,इसी में भलाई है |इससे कम सठियाये तो  दिखोगे..... |
आप दो-तीन बच्चो वाले बुजुर्ग हैं, तो आपके के साथ ,’बागबान’ टाइप का खेल-खेला जा  सकता है |फ़िल्म बागबान के ट्रेलर को याद कर लो, किस्से का खुलासा आप ही आप हो जाएगा कि कैसे बुजुर्ग-दंपत्ति का करवा-चौथ, दिल दहलाने वाला दृश्य उपस्थित करता है |
हम तो कहते हैं ‘दुनिया के बुजुर्गो एक हो’........
कहने को तो ये कह  लिए,मगर तत्काल दिमाग में आता है कि, ये एक हो के...  क्या भाडं झोक सकते हैं ?
‘भाड झोकने’ का डिटेल आपको बताएं |’भाड’ एक मिटटी का बहुत बड़ा, ऊपर चौड़े मुह का तपेला होता है |लकड़ी की जलती भट्टी या तेज आंच की  आग में, रखा जाता है|इसमें रेत को तपा कर गर्म करके ,भीगे,पर  सुखाए  चनो  को फूटने के लिए डाला जाता है |यूँ समझिये पुराने जमाने की तंदूर भट्टी ....|इसे आपरेट करने वालों को भडभुन्जिये कहते हैं | हमे लगता है इतनी उम्र देखते ये काम इनके ‘बस’ का नहीं |वरना सबसे पुराना, कम लागत वाला बिना दिमाग खर्च किये चलाने वाला ,यही सीधा- सादा धंधा था |
चलो ,आपको और काम में लगाते हैं |थैला ले के बाजार जाने का सिस्टम, जिससे आपको चाय -सिगरेट के लिए , दो पैसों की आमदनी हो जाती थी, आजकल बड़े-बड़े शापिंग-माल ने छीन लिया है  |बाकायदा बिल प्रिंट हो के हाथ में दे दिया जाता है,मसलन , घपले का कोई चांस नहीं |
        एक टी वी है जो आपके बुढापे का सहारा है |इंटरनेट ,फेसबुक,मोबाइल  को बहु  के दिए सीमित सेन्क्शंड बजट में चलाना होता है |
तो बच्चो ,यही टी वी आपको,समय समय पर , ‘तिहाड़-दर्शन’  करवाता है ,जहाँ फर्जी-डिग्री वाले अन्दर जाते दिखते हैं |ये आपको सात-समुंदर दूर, ‘लमो’ के पास भी ले जाता है जो  सात सौ करोड़ के घपले-घोटाले की वजह से अपने देश के  ‘इ डी’ तांत्रिकों द्वारा ढूढा जा रहा है,|दुनिया उनसे मिल लेती है मगर ‘न्याय’ की देखरेख करने वालों की, नजर नहीं जाती |ये वही लोग होते हैं, जिसका साथ, आपके वोट पर चुने हुए, आपके जन प्रतिनिधि,देते नजर  आते हैं|
अपने कानों पर कलयुग में विश्वास कर लेना भी संदेहास्पद है |एक राज्य है ,पत्रकार की मौत का मुआवजा दे रही है,उसके मंत्री पर ,मरते हुए  पत्रकार का बयान उसे मौत का जिम्मेदार ठहरा रहां है ,मंत्री को ढूढने में पुलिस मुहकमा अजीब सी सुस्ती में काम कर रहा है ,आम-जन का कानून अलग, मंत्री का कानून मानो  अलग..... |
अब मंत्रियों को शपथ लेते हुए हूँ भी दिखाया जाना चाहिए ,मै इश्वर की शपथ लेता हूँ कि अगर किसी काण्ड में मेरा  लिप्त होना आरोपित हुआ तो ,अविलंब पदत्याग करुगा |यदि ऐसा न कर सका तो भगोड़ा होने की दशा में मेरी सारी संपत्ति जो इलेक्शन लड़ते समय बताई गई है जब्त कर ली जावे |मै शपथ पूर्वक कहता हूँ की मेरी डिग्री के दस्तावेज फर्जी नहीं है |मुझपर बलात्कार ,चोरी ,खून डकैती के कोई आरोप नहीं है और न ही किसी अदालत में मेरी पेशी,इन आरोपी के तौर पर चल रही है |          
आपने, योग-उत्सव का,  तमाशा बतौर  अलग आनन्द लिया होगा |अपने भी हाथ पैर इधर उधर जरुर फेके-फटकाए होंगे|चार बुजुर्ग मिलकर,आप लोगों ने  लानत भी भेजा होगा..... क्या जरूरत थी इतना खर्चा करने की....... |ये लोग जनता के पैसों से, अपना वोट बेंक बढाने की ‘शाजिश’ को नए- नये नाम और लेबल देते रहते हैं |वाह री दुनिया ....इंसान में कितनी चालाकी भर दी है | इनके थिंक-टेंक को इनाम-शिनाम का इन्तिजाम भी हो जाए ,गुजरने से पहले वो भी देख लें |
.....और बुजुर्ग बच्चो .....!, आपने देखा ,अपने पी-एम् सतत लगे हुए हैं ,बाहर देशों के दौरे पर दौरे मार रहे हैं ,अभी जगह-जगह काला-धन ‘सूघने’ का प्रयास जारी है,जरूरत पड़ी तो ,छापा बाद में मारेंगे ,वे अपने प्रयास में सफल हो तो ,थोड़ा अपना जी इधर भी  हल्का हो जाए .....?
सुशील यादव

बातों का आतंकवाद .....



बातों का आतंकवाद .....

हमारे देश में टी वी युग के आरंभ से एक नए आतंकवाद का जन्म हो गया है, वो है ‘बातों का आतंकवाद’ ....|
चेनल वाले बड़-बोलों का, पेनल बना के रोज-रोज नया तमाशा परोसने में लगे हैं |अभिव्यक्ति  की स्वतन्त्रता की आड़ में भड़काऊ वाद-विवाद आये दिन जनतांत्रिक देश में, तांत्रिक रूपी एंकर द्वारा   चीख-चीख कर कहा जाता है कि ‘चैन से सोना है तो जाग जाओ’......?ये कैसी जागृति का ढिढोरा है ....?जो  जनता के कान खाए जा रही है |शायद ही इतना विस्फोटक और विनाशकारी ‘वार्ता-बम’ किसी भी देश के, मीडिया-वालों के हाथ अब तक लग पाया हो जो अपने यहाँ रोज विस्फोटित होते रहता है |
दुश्मनी भाजने में इन चेंल्बाजों का कोई  सानी नहीं|सब एकतरफा एक सुर में हमला बोलते हैं |जिस किसी का ये गुणगान कर दें उन्हें  देश की गद्दी पकड़ा के दम लेते  हैं |एक बार हादी चढाने का तजुर्बा हो गया तो प्रयोग दुहराया जाने लगा |
पर दिल्ली बिहार राज्य के  मामले में,उनकी  हांडी दुबारा चढाने की बस हसरत ही रह गई |उन्होंने अपनी तरफ से , भरपूर कोशिश की मगर जनता को बना-मना नहीं पाये |
पुराने जमाने में , इस  ‘बातूनी आतंकवाद’ का अंडर  करंट, सामन्ती-राजसी  व्यवस्था में देखने को मिलता था |किसी जगह राजा ,कहीं मालगुजार कहीं का सूबेदार तो कहीं  सूदखोर बनिया जमात   की बातें ‘दबंगई’ लिए होती थी |उनका कहा एक मायने में, कानून या  फतवा से कम नहीं आंका  जाता था |
जनता को इनका सामना करने के बाद मुक्ति मिल जाती रही हो, ऐसा भी नहीं था |वे इनके अलावा , दीगर आतताइयों से भी निपटते थे ,निपटते क्या थे अपने आप को पिटवाने  के लिए परस देते थे |वे जाति के नाम, मजहब के नाम खुद को नोचवाने -खसोटवाने के लिए बाध्य होने की श्रेणी में गिने जाते थे |
उनकी डिक्शनरी में,या उनकी सोच में ,इन आकाओं के प्रति कभी कोई असहिष्णुता का   भाव दूर दूर तक पैदा नहीं हुआ | ‘माई-बाप’ के लिए ,विद्रोह या बगावत की कभी सपने में भी सोचा जाना पाप की केटेगरी का हुआ करता था |वे दयनीय से दयनीय किसी  हालात में भी गुजरे  उनकी पत्नियों का मनोबल कभी टूटता सा नहीं दिखा करता |अपने पतियों के सामने कभी मुह नहीं खोलने वाली स्त्रियाँ, घर या गाँव छोड़ के जाने की बात कभी कर या  कह भी नहीं पाती थी ....?
अब हालात बदले हैं |अच्छी बात है कि आज  आप, जी-भर के किसी को भी कोस सकते हैं |किसी को इस मुल्क में रहने या उसका तंबू उखाड़ने की बात क्र सकते हैं |किसी को तमाचा जड़ने के लिए खुलेआम इनाम इकराम की व्यवस्था किया जा सकता है |किसी टार्गेट को उसके बयान और गतिविधियों के इतिहास का बखान करके, कालिख पोतने और पोछने की राजनैतिक कवायद की जा सकती है |एक से एक बोल-बचन,चेनल के माध्यम से हाईलाईट हुआ करते हैं |सुबह अखबार की सुर्ख़ियों में कमजोर दिल वाले पढ़ कर दुआ मनाते हैं कि फिलहाल आंच उन तक नहीं पहुच पाई है |
   मान हानि के दावे , यदि फिफ्टी परसेंट केस में ‘बुक’ होने लगे तो फरियाद में लगने वाले कागज़ की पूर्ती हेतु एक इंडस्ट्री लग सकती है |टाइपिस्ट  की इफरात मांग बढ़ सकती है ,नौकरी  के नये सेक्टर बन सकते हैं |लेपटाप की बिक्री  जोर पकड़ सकती है|  तरफदारी करने वाले हिमायती, या विरोध पक्ष के  वकीलों का अकाल पड सकता है |  
दरअसल ,इस देश में “लघु शंकाओं  का निवारण” ठीक से नहीं हो पा रहा है |सरकार सोचती है की एयर- कंडीशन-शौचालय  बना देने से बात बन जाएगी |वे गलत हैं |ये लघुशंका, किडनी उत्सर्जित ताज्य अवशेषों का नहीं है,वरन , जनता की दिमाग उत्सर्जित विष्ठा है |इसे हटाने के लिए,फकत  चार पेनलिस्टबीच अपना एक प्रवक्ता मात्र , टी वी में बिठा देने से मामला बनने  की जगह बिगड़ता दिखता है |ये लोग ताबड़तोड़ बातों की गोलियां, स्टेनगन माफिक चलाने लग जाते  हैं |इन्हें कोई भी टापिक दे दो, ये सभी  इस  मुस्तैदी से डट जाते हैं कि सालुशन केवल उनकी बात में है  |ये कभी किसी बलात्कारी संत का बचाव करते दीखते हैं तो कभी  मांस के नाम पर मारे गए व्यक्ति के, हत्यारों की पैरवी कर डालते हैं |ये लोग अपने फैब्रिकेटेड-आंकड़ों पर महीनों बहस बेवजह करवा लेते हैं कि, अमुक पार्टी क्लीन स्वीप कर रही है, जबकि परिणाम एकदम विपरीत आता है |यानी जिसका ये दम भरे होते हैं, वही धाराशायी हुआ दिखता है |टी आर पी का खेल गजब का है .....?
जनता बेचारी इडियट बाक्स के एक और  आतंक से रूबरू हो रही है ,वो है इनका बाजार भाव में अपनी टाग घुसेड़ना |
होता ये है कि जो अनाज- सब्जी आपके स्थानीय बाजार में कम कीमतों में मिल रही होती है, एक बार दिल्ली की कीमत सुनते ही अपने-आप उछल जाती है |आप बाजार में टमाटर बीस रुपये किलो में तुलवा रहे हैं, तभी दूकानदार की टी व्ही  में, अस्सी रूपये किलो का एलान होता है ,दूकानदार वापस अपनी तौल खीच लेता है |कभी दालें सत्तर-अस्सी रूपये किलो की हुआ करती थी ,इनकी  बातों ने  कीमतों में जहर घोल दिया |ये लोग ,बकायदा रिपोर्ट दिखा देते हैं, फलाने स्टेट में इस साल कम बारिश के चलते दलहन तिलहन फसल चौपट  होने के आसार हैं,लो बढ़ गए दाम |
कभी-कभी तो यूँ भी लगता है,कि  किसी सटोरिये-लाबी वालों की चल रही है वे इधर स्टाक जमा किये, उधर दाम बढ़ने की बात कह दी  |
सरकार कहाँ होती है या कहाँ  सोती है......पता नहीं चलता ?
 किसी को सुध लेने की जरूरत नहीं महसूस होती |
जनता बेचारी तंग आ के  मन बहलाव्  की  दीगर खबरों में, अपनी (अल्प) बुद्धि खर्च करने में लग जाती  हैं|
पसंद न हो तो, चेनल बदलने का अधिकार अभी सब के पास बरकरार है,यही काफी है .....|  ........  .?        
  सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग (छ.ग.)
susyadav7@gmail.com  ०९४०८८०७४२०  //२७.११.१५

सठियाये हुओ का बसंत .....





सठियाये हुओ का बसंत .....

            सठियाने की एक उम्र होती है।
बुढढा सठिया गया है कहने मात्र से किसी पुल्लिंग के साठ क्रास किये जाने की जानकारी ही नहीं मिलती, वरन कुछ हद तक उसके सनकी हो जाने,या दिमाग के 'वन बी. एच. के छाप ' हो जाने  का अंदाजा भी होने लगता   है ।
मै आम आदमी के तजुर्बे की बात कह रहा हूँ ।'राजनीती के धुरंधरों' को इस रचना-परिधि से दूर रखता हूँ क्यों कि इने-गिनो  को छोड़ , वे आजीवन नहीं सठियाते ।

        अपनी कालोनी में रिटायर्ड लोगो का ठलुआ-क्लब है।बसंत में उनकी खिली-बाछों को देखने का लुफ्त आसानी से पार्क में सुबहो-शाम उठाया जा सकता है |आठ -दस को मै बहुत करीब से जानता हूँ । शर्मा ,चक्रवर्ती, राणा ,सक्सेना ,दुबे ,असगर अली ,भिड़े,सुब्बाराव,  ये लोग जब मिलते हैं तो करेंट-टापिक पर इनकी  तपसरा या टिप्पणी से , बसंत में खिले हुए सैकड़ों फूलो का एहसास होता है।

        राणा की बल्ले-बल्ले में दिल्ली ,चक्रवर्ती बंगाल ,शर्मा हरियाणा असगर अली यू पी दुबे बिहार ,भिड़े महाराष्ट्र,सुब्बाराव जी साउथ सम्हालते हैं ।रात को देखे हुए  न्यज या सुबह  की अखबारों  की कतरन ही उनके बीच आपस में  तू -तू, मै-मै करने का इन्तिजाम करवा देता है ।

            दिल्ली वाले ने छेड़ दिया कि ये 'मफलर-बाबा' को किसी ने समझाइश दे दी है कि  दिल्ली की बेशुमार गाड़ियों में हवा ही हवा है ,इसी को लेकर ,आगे वे दिल्ली को प्रदूषण मुक्त करने की मुहीम में योजनारत  हैं। सप्ताह में एक दिन सब गाड़ियों की हवा निकाल दी जावे तो इससे वातावरण को हवा  मिल जायेगी ।यदि कहीं लोगों के बीच  से  अल्टरनेट आड- इवन के  फार्मूला का सुझाव आता है तो उस पर भी गौर किया जा सकता है ।

राणा जी के उदघोष पर पार्क  के बुजुर्गों की   सामूहिक हो- हो से पार्क गुजायमान हो गया ।कुछ आदतन छीछालेदर करने वाले , धीरे- धीरे इसके अंदरुनी पहलू की काट-छांट में, अपनी पुश्तैनी  आदत के अनुसार लग गये ।
        अपने  इधर एक परंपरा है,तथ्य और  तर्क के पेंदे को उल्ट के देखना हम जरुरी समझते हैं  ।
इस पुनीत परंपरा के निर्वाह में  लोग घुसते रहे । जानते नइ ! आड-इवन के फार्मूले में जनता को कितनी तकलीफ हुई थी। जिनके घरों में दो आड या दो इवन की गाड़ियाँ थी, वे बेचारे  बेबस हो गए थे।इमरजेंसी में किसी को हास्पिटल ले जाने की नौबत आई तो पडौसियो  ने कह दिया,भाई साहब हमारे मिस्टर  खुद कार  शेयर करके गये हैं ।हम लोग जिनसे शेयर-बंध हैं उनसे शेयर-धर्म तो निभाना पड़ता है ।आप हमारे पूल में होते तो आफिस टाइम में एडजस्ट कर लेते ।यही जवाब आम है ।

        आदनी को इन दिनों 'पूल' में होना जरुरी हो गया है ।
राज्ञीतिक लोग इसे 'गुट' सामाजिक लोग 'पार' और गुंडे मवाली 'गेंग' कहते है।साहित्यिक बिरादरी में भी यह आम है ,तू मेरी फिकर कर मै तेरी सुध लेता हूँ ।
 इस पूल, गुट, पार, गेग में होने के अलग-अलग फायदे हैं।आपकी नैया सहज  पार लगती है ,इलेक्शन टिकट की गैरंटी होती है ,ब्याह-मंगनी में सामाजिक प्रतिष्ठा के अनुसार घर-वर मिलते हैं और गेंग के रुतबे के क्या कहने ‘भाई’ का नाम लेते ही सब काम,  हुकुम मेरे आका की तर्ज पर तुरंत हो जाते हैं ।
चलो बुढाऊ लोगों के दुसरे सत्र की बात देखे ...
भाई साब ये गलत बात है ,आप वोट अलग तर्ज पर मांगते हो और वाहवाही बटोरने के लिए अलग फार्मूला ले आते हो ,कहाँ  की शराफत है .....? अरे दूबे जी आप वहीँ अटक गए वो टापिक तो सुबह ख़त्म हो गया था |

बुढउ लोगों के दिमाग की केतली से,दफ्तर के प्यून से लेकर बराक ओबामा तक सबकुछ गर्मागर्म  बाहर निकलता  है ।
एक न्यूज की कतरन दिखाता है ,देखो साला है तो महज चपरासी मगर एक करोड़ की नगदी ,गहना ,बेनामी संपत्ति ,कार और जमीन के कागज मिले हैं ।
पीछे से , हामी देने वाला कहता है,ये हाल चपरासी का है तो साहब की पूछोइ मत।  साहब लोगों की कोई खबर ले तो इनसे सौ गुना ज्यादा की रेकव्हरी की जा सकती है ।
वे लोग जब तक ,भारतीय अर्थ व्यवस्था पर अपने आक्रोश जी खोल के व्यक्त करते तब तक ,बिरादरी के कुछ लोग बहाने से खिसकने लगे | खिसके हुओं के,  जाने के बाद बातों का गेयर व्यक्तिगत आक्षेप पर चलने लगता है ।जनाब क्या खा के फेस करेंगे ,अपने जमाने में नंबर-दो का इनने कम नहीं कमाया है ।चुपचाप खिसक लिए ।कुछ विरोध दर्ज कराते हुए  कहते हैं ,हमे अपनों के बीच ये सब नहीं कहना चाहिए।सब अपनी अपनी तकदीर का खाते हैं ।पीछे जो हुआ सो हुआ आगे की बात करे.|ये कभी पकडे ही नहीं गए तो हम आप बेकार ल्कीअर क्यों पीत रहे हैं |
   आप तो हमेशा उनका पक्ष लेते हैं ,और लें भी क्यों नही .....?
.देखिये शर्मा जी ,हम कुछ बोल नहीं रहे इसके माने ये नहीं की हमे कुछ मालुम नहीं ।अगर शुरू हो गये तो .....?
बीच -बचाव बाद, करीब-करीब हुडदंगी हडकंप में तब्दील हो जाने वाली  सभा समाप्त हो जाती है ।
ऐसे मौको में ,दो-चार दिन कुछ लोग खिचे-खिचे देखेगे| ये अघोषित तथ्य है |
शर्मा जी , जिनका बचाव कर रहे थे वो शख्श , भनक लगते ही आगबबुला हो गए |वे उस दिन के प्रखर वक्ता के तत्कालिक विरोध में उनके घर की ओर रुख किये  ।उस नाचीज पर अपने राजनीतिक प्रभाव यानी गुट का वास्ता देने लगे ।हम आपसी  बिरादरी होने की वजह से,तुम्हारे  सामाजिक पहलुओं को पंचर करना भी खूब जानते हैं | उन्हें सामाजिल तौर पर तिरस्कृत करने का संकल्प गाली गलौज की मुद्रा में उठा लेते हैं ।अगर इससे भी आइन्दा बाज न आयें तो चेतावनी है ,मवाली- कुत्ते से कटवाया नहीं तो कहान्ना |उस दिन इस सरे-आम चेलेंज ने बुधु पार्टी से एक मेंबर खो दिया |
बरसों तक पार्क में मिल जुल के रहने वाले बुढढो की, जाते समय की मिल- जुल कर की जाने वाली योग की खोखली हंसी  आजकल नदारद  है ।
शायद अब पतझड़ के बाद मौसम के मिजाज में तब्दीली आये ......?
   सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग (छ.ग.)
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