Tuesday, 20 August 2013

मुझे भी तो मनाओ....

मुझे भी तो मनाओ....

मुझे रूठे या खपा हुए एक ज़माना लद गया |वो बहुत अच्छे दिन ठे जब हम रूठा करते थे और वो मनाने  का जिद ठान के बैठी होती थी|
कालिज नही जाते थे तो खबर पे खबर भिजवाए रहती थी |
खबरची भरी दोपहरी में या भीगते –भागते बारिश में आ-आ के जाने क्या –क्या बयान करता कि मन कभी या तो खबरची के हालत पे या उसके बया किए हालात पे तरस खा जाता ,और उसे पसीजने का सॉलिड बहाना मिल जाता |
अपने रूठने से अगर वो खपा हो जाती तो, स्तिथी ‘समझौते’ के लिए ‘मध्यस्थो’ की मुहताज हो जाती |
एक-दो अपनी तरफ से एक- दो उनकी तरफ से भिड पड़ते |
दोनों पक्षों के मध्य ,गिले –शिकवों की गिनती कराई जाती | तू ने ये नहीं किया ,वो नहीं किया |
मेरी क्या बताती है ,वो  अपनी कहे  मेरी एक बात कभी मानी ?कहा था क्लास छोड़ दो ,बैठ गई पीरियड अटेंड करने |एक पीरियड ‘गोल’ कर देने से कोई ‘मार्क्स’ नहीं घट जाता |
‘मध्यस्थ’,इन तू-तू,मै-मै के तोड़ निकाल लेते | ‘
युद्ध –विराम’ की घोषणा हो जाती |
बहुत अच्छे दिन थे |हंसते -हंसाते गुजर गए |
बचपन में रूठ कर ,जिद करके , अपनी बात मनवा लेने का ख्याल करके, अब बाप बनने के बाद पता चल पाया कि हम दो बच्चो की जिद से परेशान रहते है ,वे बच्चो की फौज को कैसे सम्हालते रहे होंगे ?
हमारे पडौस के मिश्रा जी को दब्बू –पति का ‘खिताब’ हर होली में हर कोई दे डालता है |वे काबिल-तौर पे हक़दार  भी हैं |पिछली होली के कपड़ों में होली मना लेते हैं |पत्नी को तिनका भर गुलाल ज्यादा  लगा दें तो उनकी भंव तन जाती है | आखे दिख गई तो हाथ में ली हुई कचौरी छोड़ देते हैं | वाजिब बात पर भी उनके रूठने का हक बनते कभी नहीं देखा |
उनको मिसाल देके ,पत्नी ताने जरूर देती है| देखो मिश्रा जी को देखो ,कैसे सर झुकाए आफिस से घर और घर से  आफिस आते –जाते हैं |एक आप हैं ,कोई अता-पता नहीं न रहता ?
मुझे पत्नी को हाबी होते देख ,खपा होने का भूत सवार हो जता है |
तुम लोगों के लिए जितना करो कम है |रोज-रोज दफ्तर में घिस-घिस के काम करो ,घडी भर सांस लेने का टाइम नही और यहाँ तुम्हारी बकवास |मुझसे उम्मीद न रखो कि मै ‘मिश्रा-जी’  हो जाऊ?
पत्नी इतनी सी बात पर काम रोको आंदोलन पर उतर कर ,बिस्तर में घुस जाती |मुझे मनाने का घडी –भर ख्याल नहीं आता |
उल्टे मुझे ‘मिश्रा-जी’ के रोल में पानए के बाद ही   अपनी गाडी, पटरी पर ला  खड़ा करती |
उनको  ‘रूठे पति को मनाने के हजार तरीके’ वाली किताब शुरू-शुरू में जब लाकर दी थी, तो उनने उसे पढ़ने की ये शर्त रखी, कि जब मै ‘रूठी पत्नी को मनाने के लाख तरीके’ वाली किताब ला कर दूंगा तो वह पढना शुरू करेगी |
मुझे आज तक वो  किताब मिली नहीं ,सो मेरे खपा हो के रूठने का हक मिल नहीं पाया |ऐसे रूठने का मकसद ही क्या जिसके मनाने वाले का आता-पता न हो |
मुझे उन रूठने वालो पर फक्र होता है जिसके लिए सरकार के मुहकमे बंदोबस्त में लग जाएँ |मंत्री-संतरी एयरपोर्ट में तैनात रहें |एक गिलास ज्यूस पिलाने के लिए मीडिया आठ-दस दिनों तक गुहार लगाती फिरे |
जूस के एक घूट भरते ही ऐसा लगे कि जनता की , महीनों की प्यास बुझ गई हो |जय-जयकार के नारों के बीच यूँ लगे कि किसी ‘जिद’ ने फतह पाई हो |
मुझे उन रूठने वालो पर भी फक्र होता है, जो खिचडी खा के कहते हैं ,बीमार हैं |
उडती ‘पतंग’ को और ढील देना गवारा नहीं समझते |
बिना मांजे के पतंग को उडाए रखने को बाध्य किए होते हैं |
‘चकरी’ लगभग इनके  हाथ में होने का गुमान पार्टी  को थोड़ा –थोड़ा होता है ,जिसकी वजह ,वो चिरौरी करते से लगते हैं |
“नीचे उतारो मेरे भइय्या तुम्हे मिठाई दूंगी ,
नए खिलौने ,माखन-मिश्री ,दूध मलाई दूंगी”
सुश्री सुभद्रा कुमारी चौहान की उक्त पंक्तियों की तर्ज पर रूठने वाले  ‘कन्हैय्या’ को उतारने के लिए अब  ‘चार्टेड-प्लेन’  की व्यवस्था है, वे मीडिया के मार्फत बात उन  तक पहुचाते हैं |क्या गजब का अंदाज है ?रूठे तो यूँ ...,खपा हों तो ऐसे.... |
हमे तो हमारी बारात में भी, “खाना है तो खाओ” के हाल पे छोड़ दिया गया था |
 काश जीवन में एक बार , हमे भी कोई यूं मनाता  ...?         
सुशील यादव
मोबाइल :०९४२६७६४५५२
२०२,शालिग्राम ,श्रिम- सृष्टी
सन फार्मा रोड ,अटलादरा
वडोदरा ३९००१२
८-६-१३


लागा चुनरी में दाग ....


हमारे उस्ताद जी को दाग –धब्बों से बहुत चिढ सी थी |वे कतई बर्दाश्त नहीं करते थे कि उनका शागिर्द किसी किस्म के उलट –फेर में पड़ा रहे |उनमे खुद कोई बुरी आदत, सिवाय एक भांग खाने के नही थी |इसे भी वो शिव –भोले के प्रसाद के निमित्त मानते थे |आयुर्वेद में हाजमा दुरुस्त रखने के अनेकानेक उपायों में से एक जानकर अपना बैठे थे |
उस्ताद जी को अखाड़े से बाहर ,हमेशा साफ –सफेद वस्त्रों में लिपटे हुए देखा |कई साबुन-डिटर्जेंट वाले विज्ञापन देने-दिलाने के नाम पे चक्कर काट गए पर उस्ताद जी को ‘झागदार’ बनाने में सफल नहीं हुए |
उस्ताद जी का कहना था कि, लोग आपको ‘झागदार’ बनाते –बनाते कब ‘दागदार’ बना देंगे कह नहीं सकते ,यानी लालच से बचो |
कम खाओ ,’बनारस’ में रहो, इस सिद्धांत को पालते –पोसते  वे कब ‘बनारसी’ हो गए पता नहीं ?
 उस्ताद जी को गुजरे अरसा हो गए ,तब से आज तक हमने किसी हार-जीत पर दांव नहीं लगाया |
फुटबाल ,हाकी ,कैरम ,क्रिकेट हमने भी कई खेल खेले पर हमें खरीदने वाला कोई माई का लाल तब पैदा नहीं हुआ|हमें फक्र इस बात का भी है हमारी बोली नही लगी |
हम तक, झांकने को नीम-बबूल दातूनो का स्टाकिस्ट तक नहीं फटका कि आओ  हमारे प्रोडक्ट के ब्रांड एम्बेसडर बन जाओ |
मजे की लाइफ थी ,खेलो और भूल जाओ |कोई रिकार्ड-विकार्ड का चक्कर नहीं |
करीब-करीब ,कबीरी जिंदगी जीने वालो का एक ज़माना था,..... गुजर गया |
’जस की तस धर दीन्ही चदरिया’...... वाले लोग अपनी-अपनी ,चादर को समेट के बेदाग़ बढ़ लिए|
जिसने ज्यादा यूज किया, वे ‘तार-तार’ होने तक भी चादर नहीं बदले |
कभी स्याही –चाय गिर गई तो बड़े-बूढों के डर से  थोड़ी बहुत धो लिए|
एक परंपरा थी कि ज्यादा ‘दाग’ लगने नही देना है |’चरित्र’ के नाम पर राम-चरित मानस की तरह जगह –जगह प्रवचन चलता था |
मास्टर जी की क्लास में कूट-कूट कर बतलाया जाता था ,ये गया तो कुछ गया ,वो गया तो ‘कुछ और...;  गया मगर ‘चरित्र’  गया.... तो समझो सब चला गया |
मास्टर जी की पकड़ से छूटते ही, दादा-बाबूजी की पकड़ में फिर वही सीख ,’चरित्र’  गया.... तो सब गया |
इन सीखो की वजह से गृहस्थाश्रम से आज तक किसी बलात्कार के कभी ब्रेकिंग न्यूज ही नहीं बने |
हमारी खानदानी ‘चादर’ बेदाग़ रह गई |हमारी खुद की भी बेदाग़ रह गई |
हमने ‘दाग अच्छे हैं’जब से सुना, हमारे होश गुम हो गए|माना कि तुम्हारे पास अच्छे डिटर्जेंट हैं, इसका ये मतलब नहीं कि तुम इतराओ ,‘दाग’ में सूअरों की तरह लोट जाओ |
धोने वालो का तो ख्याल रखो उनके पास और भी तो काम हैं तुम्हारे दाग छुडाने के |
ड्राई -क्लीन के जमाने में मिस्टर क्लीन कहलाना या  हो जाना अलग मायने रखता है |हमारे जमाने में किसी गलती से, चरित्र पर शंका उत्पन्न हो जाती थी तो अग्नि परीक्षा ,सामाजिक बहिस्कार,तिरस्कार ,गंगा स्नान और न जाने क्या –क्या उपाए किए-सुझाए जाते थे|
लोग स्वस्फूर्त साधू बन के गायब हो जाया करते थे ,वे तब बाहर आते थे जब ज्ञान का अकूत भंडार उनके पास हो जाता था |प्रवचन वे तब भी ‘चरित्र’ के मुद्दे पर ही किया करते थे |
      ढीले-करेक्टर वालों के आंकड़े सुनते–सुनते अब तो मानो कान पक जाते हैं |दो-चार साल के बच्चो पर रेप,मनमाना घूस ,पुलसिया इन्काउंटर ,नेताओं के बहके –बहके बयान, खेल के भीतर खेल |
इमान्दारी से देखा जाए तो आज जितने जेल हैं ,उतने की ही और जरूरत है |
इन ढीले-करेक्टर वालो को, हम लोगो ने बहुत सहा है |मूक दर्शक बन के करोडो लोग अपना धन और समय की बर्बादी कर रहे हैं |बहिस्कार –तिरस्कार की भाषा में निपटने की बजाय चेनल वाले अपनी रोटी सेक रहे हैं ?अखबार वाले जगह दे रहे हैं ?
यों नहीं होना चाहिए कि इनकी ‘चादर’ इनसे छिन ली जाए ?बिना दाग- धब्बे की इनकी केवल नंगी पहचान बनी रह जाए?......
सुशील यादव
श्रीम-सृष्टि ,२०२ शालिग्राम सनफार्मा रोड
अटलादरा वड़ोदरा ३९००१२
       
 मोबाइल 09426764552

जड खोदने की कला


जंगल विभाग से उनका रिटायरमेंट क्या हुआ वे पडौसियो के लिए कष्ट दायक हो गए |कही भी चले आते हैं |तरह –तरह की खबर ,दुबे,चौबे,शर्मा ,द्वेवेदी सब के घरों का हाल उनसे मुह –ज़ुबानी पूछ लें |कहाँ  क्या चल रहा है?उन्हें एक-एक की खबर होती है |
उनको , चूहों से अगर बच गए हों तो,घर के , पूरे साल भर के अखबार की खबरों  को कुतरने में चंद दिन लगते हैं |
अखबार पढ़ने के बारे में वो कहते हैं कि जंगल के सर्विस में उनको स्टडी का मौक़ा नहीं मिला सो वे राजनैतिक –सामाजिक सरोकार से दूर थे |अब फुर्सत है सो अध्ययन –मनन में समय बिताने की सोच रहे हैं |
मैंने कहा ,फिर अखबार ही क्यों ?मनन –चिंतन के लिए साहित्य का भण्डार है ,पढते क्यों नहीं ?
वो बोले अब साहित्य-वगैरा पढ़ के कोई एक्जाम तो पास करना नहीं है |मोहल्ले –पडौस में ज्ञान बघारने के लिए रोज टी वी देख लो , कुछ अखबार बांच लो  काफी है |
मैंने मन में सोचा ,पांडे जी का तर्क अकाट्य है |हर आदमी इतना ही ज्ञान रखता है  इन दिनों|काम  चलना चाहिए |ज्यादा ज्ञानी हुए नही कि समाज  के लिए  मिस-फिट हो जाता है आदमी|
मैंने पांडे जी को छेड़ते हुए कहा ,चुनाव-उनाव क्यों नहीं लड़ लेते |अभी पार्षद बनने का ,फिर अगले साल एम् एल ए बनाने का खूब मौक़ा है |
उसे लगा कि मैंने उनको बुढापे की वैतरणी पार करने का नुस्खा दे दिया है |
वो तुरंत लपक लिए , ऐसे आदमी मुझे भले लगते हैं जो बिना किसी तर्क के मेरी बात मान लेते हैं , बोले ऐसा हो सकता है?
अपने को एम्.एल.ए तक तो जाना नहीं है |खर्चा बहुत होता है ,पूरा पेंशन निपट जाएगा तो खायेंगे-पहनेंगे   क्या ?
पांडे जी को जितना लाइटली मै लेता था उतने वो थे नहीं |जिस आदमी को पेंशन बचाने का शऊर हो, वो आर्थेक मामले में  भला कहाँ से किसी के कहने में आ सकता है ? किसी के चढाने को वे उसी हद तक लेते थे जितनी वे चढ़ सकें |बहरहाल उनने मेरी सलाह को ,बतौर टर्निग –प्वाइंट नोट कर लिया |वे चले गए |
अगले महीनों तक वे कई बार टकराए , कभी सब्जी –भाजी ले कर बाजार से लौटते हुए , कभी किराने का सामान लादे हुए |हाय –हेलो से ज्यादा बात नहीं हुई |एक दिन वे रेल -रिजवेशन की लाइन  में लगे थे ,मैंने पूछा ,पांडे जी कही घूमने जा रहे हैं क्या  ?
वो बोले , बोले क्या बस महीने भर की दास्तान सुनाने लगे | किस–किस नेता से मिले ,कितनी पार्टी का चक्कर लगाया |सक्रिय सदस्य बनने के लिए कई एक  पार्टी का मुआयना कर आए हैं |
अब अभी राजधानी जा रहे हैं |दो-तीन पार्टी   हेड से मिल देखते हैं ,देखे क्या बनता है ?
मैंने कहा , पांडे जी मैंने तो यूं ही मजाक में कह दिया था ,चुनाव-सुनाव के बारे में |आपने सीरियसली ले लिया |मुझे अपने कथन के साथ –साथ , पांडे जी में भविष्य का पार्षद भी दिख रहा था, उनकी जीवटता को देखते हुए |
उनका रिजर्वेशन का नम्बर आ गया वे टिकट ले लिए |दूसरी जगह जाने के लिए मेरा  टिकट वेटिंग का निकला सो मैंने अपना निर्णय बदल दिया |
वो ऑटो से आए थे मगर वापसी में मेरे स्कूटर में चिपक लिए |
रास्ते भर लोकल पालटिक्स की बातो से  ऊपर नहीं उठे|सब की बखिया उधेडते रहे |मेयर ने पानी की टंकी में किताना छेद किया |दीगर पार्षद क्या –क्या गुल खिला रहे हैं |विधायक रात  कहाँ सोने जाता  है |मुझे लगा महीने भर में पांडे जी ने थीसिस जितना आंकड़ा जमा कर लिया है |मन ही मन ,उनके खोजी चालूपन को दाद दिए बिना नहीं रह सका|
मैंने पूछा ये सब इतनी जल्दी कैसे जमा हो गया?बहुत मेहनत  की होगी आपने ?
वो मंजे हुए अंदाज में कहने लगे ,हाँ मेहनत तो होती है |जंगल में हम लोग खूब मेहनत किए हैं |हम लोग मिनिस्टर –अफसरान को शेर दिखने के लिए जो तरीका अपनाते रहे, वही यहाँ काम करता है |खबर को बाहर निकालने के लिए ‘मचान’ बाँध कर बैठो |शेर को कुछ भूखा रखो ,चारा –पानी का सही इंतजाम हो तो हांके में शेर आ जाता है |दफ्तर के छोटे –छोटेबाबू,  बाबूनुमा अफसर या दफ्तर के बेवडो को, अर्जी पकड़ा दो वे सब लेखा-जोखा आप ही आप समझा देते हैं |ध्यान से सुनो तो वे, आकडे देते वक्त साहब लोगो के ‘गुणगान’ यूँ करते हैं कि वो तो पाक साफ हैं बाकी सब उनको ही पहुचता है | 
मेरा स्कूटर कई बार, पांडे जी के बयान से दचके खाते-खाते बचा |मैंने मन ही मन सोचा पांडे ने कमाल का काम किया है |मैंने चलते में पूछ लिया ,पांडे जी ,लगता है ,जंगल मुहकमे में पेडों को जम के उखाड़ा है आपने  |
जमी हुई जडो को अच्छी तरह से उखाडने वाले पांडे जी के प्रति मेरी प्रजातंत्रीय-श्रधा जाने क्यों उंमड आई|
मेरे कटाक्ष पर वे ही.-ही कर हंस दिये|
मुझे हल्का सा ब्रेक लगाना पड़ा |घर भी करीब था वे उतर लिए |
मै पांडे जी के रूप में जाते हुए, भावी पार्षद को देख रहा था |उनमे  मुझे एक कर्मठ नेता की आगामी छवि  दिख रही थी|
शायद प्रजातन्त्र की  नीव रखने वालो ने, उसकी  इमारत की  खिडकी – दरवाजों में ,कभी दीमक या घुन लगने के बारे में  सोचा भी नहीं होगा?
बहरहाल , मुझे पांडे जी में कोई ओछापन नहीं दिख रहा था ,उस जैसे जुझारू आदमी को झोककर छोटी-मोटी परेशानियों से बाहर निकला जा सकता है
|मै अपने आकलन में अलग से जुट गया |
उंनके पार्षद बन जाने पर,मेरे घर के सामने सड़क के बीचो-बीच खड़े खम्भे को उखडवाने का, शायद मै उनको पहला काम सौपूं ? सुशील यादव न्यू आदर्श नगर दुर्ग


वे पीट रहे हैं ......


......
ये पढ़ के आपको लगा होगा कि वे कहीं मास्टर जी होंगे ,बच्चो से नाराजगी निकाल रहे होंगे|
दूसरा ख्याल गुंडा-मवाली को लेकर आया होगा ,हो न हो , हप्ता वसूली के विवाद में पिटने –पिटाने वाला खेल खेल रहे होंगे |
आपने ये भी सोच लिया होगा कि सांप निकल जाने पर कोई लकीर पीट रहा होगा |
ना भाई ना  आप, कदाचित सर्वथा  गलत हैं|
वे जम के पीट रहे हैं, बोलते ही आप समझ जाएगे, कि उनकी नम्बर दो की कमाई जम के हो रही है |
रिश्वत के छोटे –मोटे संस्करणों की जानकारी मुझे बचपन से थी |
 पडौसी  रामदीन ,जो नजूल दफ्तर में चपरासी था ,के घर से चिकन बिरयानी ,बासमती चावल की आए दिन  खुशबू आया करती थी |अम्मा –बापू बतियाते थे ,अच्छी कमाई कर रहा है |
बापू को अम्मा कोसते हुए कहती ,ये मास्टरी वगैरह छोडो ,ढंग की कोई नौकरी कर लो |
बापू बस में कुछ और करने का रहा क्या था सो करते ?बस  कुछ और बच्चे ट्यूशन पढाने बटोर लाते | अम्मा  चांदी के गहनों में इजाफा कर  लेती और खुश हो जाती |
लखन मास्टर के बेटे ने ओव्ह्र्सीयर बन के खूब कमाई की|दुमंजिला बनाते तक तो वो ठीक-ठाक  रहा |फिर बाद में अक्सर झूमते –झुमाते घर आने लगा |
रिश्वत की ‘खुशबू’ के बाद रिश्वत का ‘झूमना’ देखा |
शादी –ब्याह की पार्टी में मिश्राइन भाभी का ‘ज्वेलरी- शो ‘,शर्माइन का साडी कलेक्शन पर व्याख्यान, सब को अपनी ओर खिचे रहता था |क्या ठाठ थे उनके |
वे अपने-अपने पति के मेहनत(रिश्वतखोरी) का  गुणगान करते नहीं अघाती थी |चन्नू के पापा , जब भी कोई नया टेंडर खुलता है ,मुझसे पूछ जाते हैं,कोई सेट चाहिए क्या?
हमारे शर्मा जी दौरे से लौटते हुए कुछ न कुछ उठा लाते हैं |मै इंनपे बिगडती हूँ ,ये क्या वही-वही फिरोजी कलर ,मै तो उकता गई हूँ |
वो पार्टी में मजे से रस-झोल गिराते –गिराते खाती ,दुबारा वो साडी या तो काम वाली बाई के  हत्थे चढती या उनके बदले  कटोरी –गिलास-बाल्टी खरीद लेती |
सुबह-सुबह ,मार्निग वाक् में हम लोग पिछले चौबीस घंटों की  घटनाओं का जिक्र कर ही लेते थे |रविवार की सुबह तो सविस्तार बहस हो जाती थी |रिपीट टेलीकास्ट की नौबत बन जाती थी |
हाँ तो बद्रीधर जी ,जो आप क्या –क्या कह रहे थे परसों ,कि हमने  शहर के चमचमाते नेमप्लेट ,कुत्तों से सावधान वाले घरों को देख के  कभी सफेद -काली कमाई  का आकलन किया है ?
ये तो वाकई सोचने वाली बात है ,कि जिस घर के सामने कलफदार कपड़ों में दरबान हो ,खुशबूदार फूल ,कारीने से कटे पौधे , हरे-भरे  लान हो  , ये सब सेठ –मारवाड़ियों के ठाठ नहीं होते|
वे अपनी कमाई की नुमाइश लगाने की बजाय शाप या फेक्ट्री में खपा देते हैं |
ये ठाठ तो यकीनन अफसर या मंत्री के होते हैं | 
दीवाली –होली तो ये लोग ही खूब मनाते हैं |
रात में नियत समय बाद पटाखे छुटाने की मनाही के बावजूद दो-तीन बजे तक  धमाल किए रहते हैं |पता नहीं इनके कौन से आका-काका पटाखों का जखीरा छोड़ गए होते हैं ?
ताश की तीन-पत्ती में इनको  ‘ब्लाईंड’ खेलते देख के तो यूं लगता है कि इनका बस चले तो , पूरे देश का बजट यहीं झोंक दें|
होली में इनको पक्का रंग मिलता है |इनके यहाँ रंगे जाने का मतलब हप्ते –दस दिन के लिए कलरफुल बने रहना |
सब ओर ‘ड्राई’ रहते हुए, इनके तरफ बाल्टियाँ भरी होती हैं |इनके इन्तिजाम मास्टर अचूक होते हैं |इनको कहीं से कोई आदेश नहीं होता, स्वस्फूर्त संचालित हुए से रहते हैं |
जो पीट रहे होते हैं ,उनसे  ‘पिटने-वाले’ बकायदा बहुत खुश रहते हैं |
ऐसा अजूबा, ऐसे सम्बन्ध, बाप-बेटे ,मजदूर –मालिक या दुनिया के किसी रिश्ते में नहीं मिलता |
ये दो-धारी तलवार, जहाँ  धार के एक ओर  ‘नोक से लेकर पकड’ तक -चपरासी ,बाबू ,क्लर्क ,मुंसिफ ,दरोगा ,डाक्टर,इंजिनीयर ,संतरी-मंत्री हैं ,वहीं दूसरी ओर इनसे फ़ायदा उठाने वाले ठेकेदार और ले-दे कर काम करवाने वाले लोग होते हैं |
 इन दोनों ‘धार’ की मार आखिर में येंन-केन प्रकारेण जनता झेलती है |
 किसी शहर के सुपर सिविल लाइंस के किसी भी घर का  इतिहास  झाँक लो , जो आज्  दस-बीस-पचास –सौ ,हजार करोड के मालिक हैं ,कल तक वे टूटे स्कूटर में घूमते पाए जाते थे |
पंचर बनाने के जिनके पास पैसे न थे वे आज चार –छ: गाडियां लिए फिरते हैं |
इन्होंने ,जंगल बेच दिए ,जमीन बेच दी, खदान लुटा दिए,टेंडर में घपला किए ,खरीद में, दलाली में  हर लेन-देन में गफलत, कमीशन |
चाल-चरित्र और चेहरे में  मासूमियत लिए, हर पांच साल बाद आ फटकने वाले लोग कब देश बेच खाएं कुछ कहा नहीं जा सकता ?   


**सुशील यादव ,श्रिम सृष्टि, अटलादरा,सन फार्मा रोड ,वडोदरा (गुज) 

सन्मार्ग में चलने की सलाह


जितनी मेरी उमर है लगभग उतने सालों से (चलिए ,दो एक कम कर लीजिए) मै चलने-चलाने के नाम पर एक ही रिकार्ड सुनते आया हूँ ,सन्मार्ग में चलो ,सन्मार्ग में चलो |
सन्मार्ग क्या होता है, शुरू-शुरू में मै समझा भी नहीं करता था|
सन्मार्ग के नाम पर शहर कि गलियों के ख़ाक छानता कि किसी एक रास्ते में इस नाम का बोर्ड लिखा होगा |मगर वो बात बचपन की नासमझी के सिवा कुछ न था |
हाँ ,साफ–सुथरी गलियाँ, शहर के सिविल लाइन इलाके में दिख जाती|यहां शहर के सभ्रांत–जनो का निवास हुआ करता था |थोड़ा –बहुत इसे ही सन्मार्ग-टाइप समझ के, रोज एक चक्कर मार लिया करता |
इस चक्कर मारने के चक्कर में,सिविल लाइन्स के हर एक घर के नेमप्लेट,वहा रहने वालो के केरेक्टर -कुत्तों  को जानने लग गया था |   
जब कुछ बड़ा हुआ तो ये लगने लगा कि जिस रास्ते पर मै चल रहा हूँ वो किसी मायने में सन्मार्ग है ही नहीं  |केवल साफ सुथरे रास्ते को सन्मार्ग का पर्यायवाची मान लेना सरासर गलत था |
जैसे-जैसे  समझ बढ़ी हर राह  गलत लाने लगा  , यूँ महसूस होता कि हर रास्ता झूठा है , मिथ्या है ,शार्टकट  है| वो रास्ता जो आसान है, इसलिए भले ही किसी नाम से जाना जाए , सन्मार्ग–रोड जैसे नाम का  ‘टायटल-याप्ता’ हो नहीं सकता |
उन दिनों स्वयं से ये तर्क भी करता था कि  शायद कठिन रास्तों  को सन्मार्ग माना जाता होगा ?
सब लोगों के चलने वाला सहज राह, कभी सन्मार्ग नहीं हो सकता |ये किताबी ज्ञान, सामान्य-जन के माफिक  मन में भी जिस रस्ते आया उसका अंत मैंने किसी मंदिर के चौखट में होते देखा |
मैंने ये मह्सूस किया कि ,इक्का-दुक्का जिस पगडंडी को इस जिद से पकड़ लें, कि चलो कहीं तो जा के रास्ता खुलेगा,या वे जो अक्सर, दाढ़ी के चार –छ:-दस  इंच बढने तक,  फकत घूमते रहते हैं ,अपने –आप सन्मार्गी की श्रेणी में ले आते हैं |
मैंने ऐसा कभी, न देखा न सुना कि अमुक सन्मार्गी हुए और उधर  ही मर –खप गए |
नहीं,सभी सन्मार्गी ,बदले हुए छोले में  वापस आते हैं |
वे अपना चेला बनाते हैं  |
अपने गुरुत्व के गुरुत्वाकर्षण का बोध कराते हैं |
वे अब  सम्मान पाने के लिए , जुलूस में भाग लेने के लिए, ‘अगुवा टाइप’ प्रमुख ,सम्माननीय   बन गए होते हैं|
वे बने हुए मंच पर, ज्ञान का पिटारा खोलने के उस्ताद -माहिर हो गए होते हैं|
वे गुमे हुए कुत्ते से लेकर ,गड़े हुए धन का पता शर्तिया बता देने का दावा करते हैं |
वे आइन्सटाइन के ‘प्रकाश की गति’ से भी तेज गति से लोगो को ‘ब्रम्हान्ड’ की परिक्रमा करवा देते हैं |हर विज्ञान की पकड़ इन्ही के पास होती है|वे केंसर ,टी.बी.हार्ट, लंग, लीव्हर के पारखी होते हैं |इनके इलाज से मरीजो को स्वस्थ होते सुना जाता है |
  लोग सन्मार्गी बनाए जाते हैं ,ऐसी मेरी धारणा थी  |ये भी सोचता था कि सन्मार्ग धारण करने में पाँव में कंकर –कांटे चुभते हैं ,यहाँ शोर्टकट वाला कोई फार्मूला नहीं होता|
ऐसे महा-अवतारीयों के इंटरव्यू पढने- सुनने के लिए मै अक्सर ,मेक्जीन-टी.व्ही खंगालते रहता हूँ |
स्कुल के दिनों से मै उत्पाती किस्म का था|बस्ता फ़ेंक के सीधे खेलने  बच्चो के बीच जा घुसता |
हमें खिलाव, नहीं तो खेल बिगाड़ देंगे वाले तर्ज पर, अड जाते |हमे अड़ा देख, वे मजबूरन हमें, किसी दाम देने वाले, पाले की तरफ धकिया देते |
पिताजी को हमारे उछल-कूद की ,दिन–भर की रिपोर्ट जाने कहाँ से मिल जाया करती, वे मेरे भविष्य को लेकर चिंतित दीखते |अम्मा के कहने पर, कि इनके कदम बहक रहे हैं ,मुझे अच्छे से अच्छा जूता ला के देते, कि चलो ,बेटा अच्छी संगत में अच्छे रास्ते चल निकलेगा |
मै उन जूतों को पहन के हप्ते –भर बाद मंदिर जाता और बिना जुते  के वापस लौटना पडता,क्योकि  कोई न कोई अच्छे जुते देख के अपना पैर घुसा ही  दिया होता ?
साम्यवाद का तडका कहीं भीतर लगा था, सब साथ के बच्चे या तो नंगे पैर या स्लीपर –चप्पल वाले थे,उनके बीच मै मिस-फिट हो जाउंगा? ये अटपटापन कहाँ चल पाएगा ?इस इच्छा के चलते जुते  गंवाने का अफसोस कभी हुआ हो ऐसा नहीं लगा|सो अच्छी तरह ,आदत ही नहीं बनी, जूता पहन के चलने की |
बिना जुता ‘पहने-खाए’ आदमी  की औकात पता नहीं लगती ?अच्छे जुते पहने हैं, तो बड़े आदमी-अफसर हो सकने का गुमान होता है|ज्यादा जूते खाए हों तो आपके दुरुस्त हाजमे,अच्छी  सहन शक्ति और पहुचे हुए ‘भाई’ होने का बयान किसी से पूछना नहीं पडता |
    हमारे बगैर जूतों के पैर ,हवाई चप्पल में अपना इम्प्रेशन कभी नहीं छोड़ पाई है , अक्सर शापिंग –माल  ,सिविल –लाइंसऔर राजपथ में ,  धकिया दिए जाते हैं |
किसी भी इंटरव्यु में हमारे  दो-चार नम्बर,जूता-विहीन असंस्कृत,असभ्यता के नाम पर ,यूं ही कट जाते रहे |
बिना जूतों के ,मानो हम, बीच में फंसे त्रिशंकू हो गए|
कभी-कभी ये मलाल होता है कि पिताजी के दिए ‘जूतों’ को सर-माथे लगा के पहन लिए होते तो अवश्य ही  कहीं, साहिबी कर रहे होते |
अगर जुता परहेजी ही थे ,तो कम से कम ,चप्पल भी नहीं पहनते , नंगे  पैर किसी पगडंडी पकड के घूम –घाम के लौट आए होते, तो यकीनन आज  एक सन्मार्गी  दढियल सिद्ध-पुरुष होते |
इस  हालत में, कम से कम इतनी तो क्षमता होती कि, देश को सन्मार्ग की पटरी पर लाने का भुलावा देकर किसी ‘मरणासन्न-पार्टी’,को कुछ वोट बटोर के दे पाते ?
सुशील यादव

वड़ोदरा