Tuesday, 20 August 2013

सन्मार्ग में चलने की सलाह


जितनी मेरी उमर है लगभग उतने सालों से (चलिए ,दो एक कम कर लीजिए) मै चलने-चलाने के नाम पर एक ही रिकार्ड सुनते आया हूँ ,सन्मार्ग में चलो ,सन्मार्ग में चलो |
सन्मार्ग क्या होता है, शुरू-शुरू में मै समझा भी नहीं करता था|
सन्मार्ग के नाम पर शहर कि गलियों के ख़ाक छानता कि किसी एक रास्ते में इस नाम का बोर्ड लिखा होगा |मगर वो बात बचपन की नासमझी के सिवा कुछ न था |
हाँ ,साफ–सुथरी गलियाँ, शहर के सिविल लाइन इलाके में दिख जाती|यहां शहर के सभ्रांत–जनो का निवास हुआ करता था |थोड़ा –बहुत इसे ही सन्मार्ग-टाइप समझ के, रोज एक चक्कर मार लिया करता |
इस चक्कर मारने के चक्कर में,सिविल लाइन्स के हर एक घर के नेमप्लेट,वहा रहने वालो के केरेक्टर -कुत्तों  को जानने लग गया था |   
जब कुछ बड़ा हुआ तो ये लगने लगा कि जिस रास्ते पर मै चल रहा हूँ वो किसी मायने में सन्मार्ग है ही नहीं  |केवल साफ सुथरे रास्ते को सन्मार्ग का पर्यायवाची मान लेना सरासर गलत था |
जैसे-जैसे  समझ बढ़ी हर राह  गलत लाने लगा  , यूँ महसूस होता कि हर रास्ता झूठा है , मिथ्या है ,शार्टकट  है| वो रास्ता जो आसान है, इसलिए भले ही किसी नाम से जाना जाए , सन्मार्ग–रोड जैसे नाम का  ‘टायटल-याप्ता’ हो नहीं सकता |
उन दिनों स्वयं से ये तर्क भी करता था कि  शायद कठिन रास्तों  को सन्मार्ग माना जाता होगा ?
सब लोगों के चलने वाला सहज राह, कभी सन्मार्ग नहीं हो सकता |ये किताबी ज्ञान, सामान्य-जन के माफिक  मन में भी जिस रस्ते आया उसका अंत मैंने किसी मंदिर के चौखट में होते देखा |
मैंने ये मह्सूस किया कि ,इक्का-दुक्का जिस पगडंडी को इस जिद से पकड़ लें, कि चलो कहीं तो जा के रास्ता खुलेगा,या वे जो अक्सर, दाढ़ी के चार –छ:-दस  इंच बढने तक,  फकत घूमते रहते हैं ,अपने –आप सन्मार्गी की श्रेणी में ले आते हैं |
मैंने ऐसा कभी, न देखा न सुना कि अमुक सन्मार्गी हुए और उधर  ही मर –खप गए |
नहीं,सभी सन्मार्गी ,बदले हुए छोले में  वापस आते हैं |
वे अपना चेला बनाते हैं  |
अपने गुरुत्व के गुरुत्वाकर्षण का बोध कराते हैं |
वे अब  सम्मान पाने के लिए , जुलूस में भाग लेने के लिए, ‘अगुवा टाइप’ प्रमुख ,सम्माननीय   बन गए होते हैं|
वे बने हुए मंच पर, ज्ञान का पिटारा खोलने के उस्ताद -माहिर हो गए होते हैं|
वे गुमे हुए कुत्ते से लेकर ,गड़े हुए धन का पता शर्तिया बता देने का दावा करते हैं |
वे आइन्सटाइन के ‘प्रकाश की गति’ से भी तेज गति से लोगो को ‘ब्रम्हान्ड’ की परिक्रमा करवा देते हैं |हर विज्ञान की पकड़ इन्ही के पास होती है|वे केंसर ,टी.बी.हार्ट, लंग, लीव्हर के पारखी होते हैं |इनके इलाज से मरीजो को स्वस्थ होते सुना जाता है |
  लोग सन्मार्गी बनाए जाते हैं ,ऐसी मेरी धारणा थी  |ये भी सोचता था कि सन्मार्ग धारण करने में पाँव में कंकर –कांटे चुभते हैं ,यहाँ शोर्टकट वाला कोई फार्मूला नहीं होता|
ऐसे महा-अवतारीयों के इंटरव्यू पढने- सुनने के लिए मै अक्सर ,मेक्जीन-टी.व्ही खंगालते रहता हूँ |
स्कुल के दिनों से मै उत्पाती किस्म का था|बस्ता फ़ेंक के सीधे खेलने  बच्चो के बीच जा घुसता |
हमें खिलाव, नहीं तो खेल बिगाड़ देंगे वाले तर्ज पर, अड जाते |हमे अड़ा देख, वे मजबूरन हमें, किसी दाम देने वाले, पाले की तरफ धकिया देते |
पिताजी को हमारे उछल-कूद की ,दिन–भर की रिपोर्ट जाने कहाँ से मिल जाया करती, वे मेरे भविष्य को लेकर चिंतित दीखते |अम्मा के कहने पर, कि इनके कदम बहक रहे हैं ,मुझे अच्छे से अच्छा जूता ला के देते, कि चलो ,बेटा अच्छी संगत में अच्छे रास्ते चल निकलेगा |
मै उन जूतों को पहन के हप्ते –भर बाद मंदिर जाता और बिना जुते  के वापस लौटना पडता,क्योकि  कोई न कोई अच्छे जुते देख के अपना पैर घुसा ही  दिया होता ?
साम्यवाद का तडका कहीं भीतर लगा था, सब साथ के बच्चे या तो नंगे पैर या स्लीपर –चप्पल वाले थे,उनके बीच मै मिस-फिट हो जाउंगा? ये अटपटापन कहाँ चल पाएगा ?इस इच्छा के चलते जुते  गंवाने का अफसोस कभी हुआ हो ऐसा नहीं लगा|सो अच्छी तरह ,आदत ही नहीं बनी, जूता पहन के चलने की |
बिना जुता ‘पहने-खाए’ आदमी  की औकात पता नहीं लगती ?अच्छे जुते पहने हैं, तो बड़े आदमी-अफसर हो सकने का गुमान होता है|ज्यादा जूते खाए हों तो आपके दुरुस्त हाजमे,अच्छी  सहन शक्ति और पहुचे हुए ‘भाई’ होने का बयान किसी से पूछना नहीं पडता |
    हमारे बगैर जूतों के पैर ,हवाई चप्पल में अपना इम्प्रेशन कभी नहीं छोड़ पाई है , अक्सर शापिंग –माल  ,सिविल –लाइंसऔर राजपथ में ,  धकिया दिए जाते हैं |
किसी भी इंटरव्यु में हमारे  दो-चार नम्बर,जूता-विहीन असंस्कृत,असभ्यता के नाम पर ,यूं ही कट जाते रहे |
बिना जूतों के ,मानो हम, बीच में फंसे त्रिशंकू हो गए|
कभी-कभी ये मलाल होता है कि पिताजी के दिए ‘जूतों’ को सर-माथे लगा के पहन लिए होते तो अवश्य ही  कहीं, साहिबी कर रहे होते |
अगर जुता परहेजी ही थे ,तो कम से कम ,चप्पल भी नहीं पहनते , नंगे  पैर किसी पगडंडी पकड के घूम –घाम के लौट आए होते, तो यकीनन आज  एक सन्मार्गी  दढियल सिद्ध-पुरुष होते |
इस  हालत में, कम से कम इतनी तो क्षमता होती कि, देश को सन्मार्ग की पटरी पर लाने का भुलावा देकर किसी ‘मरणासन्न-पार्टी’,को कुछ वोट बटोर के दे पाते ?
सुशील यादव

वड़ोदरा

समान विचार-धारा के कुत्ते


शुरू शुरू में जब इस कालोनी में रहने आया तो बहुत तकलीफ हुई |सीसेन(शेरू) को भी नया माहौल अटपटा लगा |
अपने देहात में, जो ‘आजादी’ कुत्ते और आदमी को है, वो काबिले तारीफ है |
कुत्तों को खम्बे हैं आदमी को झाड –झंखार ,खेत-मेड,तालाब, गढ्ढे हैं |पूरी मस्ती से, जहाँ जो चाहे करो |
आदमी को,देहात में  समान विचार-वाले लोग, गली-गली मिलते रहते हैं |जय -जोहार और खेती –किसानी के अतिरिक्त विचारों का आदान –प्रदान कम होता है |
गाँव के आदमी और कुत्ते में ,वैचारिक-खिचाव लगभग नही के बराबर होता है, कारण कि अगर वे आदमी हैं तो  बारिश होने, न होने ,कम होने की चिंता से वे ग्रसित रहते हैं| अगर कुत्ते हैं तो पिछले बरस महाजन के यहाँ शादी में खाए हुए दोने पत्तलों के चटकारे लेने में मशगूल रहते हैं |वे इसी को बहस के मुद्दों को  लंबे –लंबे खीचते रहते हैं |अब भला इन  बातों से, टकराव का वायरस कहाँ  तक पनपे ?और टकराव हो भी जाए तो, वो तो बारिश है उसे एक ही के खेत में कब गिरना है ,वो अपनी मर्जी से ,अपने हिसाब से ,अपने तरीके से भरपूर गिरेगा |जिसे जो चाहे करना हो कर ले |
गाव के शांत माहौल को ‘बाहरी-हवा’ से निपटने में दम फूल सा जाता है| एक बाहिरी ‘हवा’ है , जो गाव के शांत माहौल को कभी –कभार बिगाड़ के रख देती है |चुनाव आते ही गाव दो खेमो में बट जाता है |
’बाहरी-हवा’ ,ज्ञान का पाम्पलेट, जहां –जहाँ बाँट के चल देती है,लोग मौसम को भूल जाते हैं |कुत्ते पोस्टरों में टाग उठाने की कोशिश करते हैं मगर उस तक पहुच नहीं पाते |
सामान विचारों वाले देहात में खलल पैदा हो जाती है |
बाहरी हवा के कारनामे,गाँव के  कुत्ते भी बखूबी समझते हैं|माहौल बिगडते देख ,वे इतने जोर -जोर से भौकने लग जाते हैं कि पडौस के गाव भी झांकने आ जायें |
‘बाहरी-हवा’ ने गांव में एक दिन कुहराम मचा दिया  ,सर –फुटौव्वल का माहौल बना दिया |
वे अपने नेता को ‘सेकुलर’बताने के चक्कर में हरेक कौम के लोग इक्कठा करने लगे |
लठैत के सहारे उनके नेता सेकुलर हो गए  |भाषण पर तालियाँ पिटी,टी.व्ही कवरेज मिला ,माहौल पर सेकुलर की हवा मानो छा सी  गई |
देहातियों  को बहस का नया शब्द ‘सेकुलर’ मिल गया |
वे आए दिन बहस करने लगे |
सेकुलर दिखाने के लिए ,आपस में टोपियां बदलने लगे |
वे टोपी बदलते-बदलते, कब सर के बाल नोचने लगे ,कब सर को धडाम से वजनदार लोहे की टोपी पहनाने लगे ?
पता ही नहीं चला |
गाव  में सामान-विचारों के मुद्दे पर लोग बटने लगे,विचारों का पोस्टमार्टम होने लगा ,तर्क हाशिए पर जाने लगा ,कुतर्क वालो के पास भीड़ जुटाने लगी |बातो की इतनी  छीछालेदर गाँव ने कभी देखी  न थी |
कुत्ते हरेक को कुतर्की समझ ,दूर –दूर तक भौकते -पछियाने लगे |गाव अब रहने लायक रह नहीं गया |
माहौल इतना बिगडते चला कि, मुझ जैसे समझदार लोग गाव छोड़ देने में समझदारी देखने लगे |
सो गाँव से शहर के सभ्रांत  कालोनी में आ बसा हूँ |
कुत्ता साथ में लाना पड़ा,वहाँ किसके भरोसे छोड़ता ?
मगर सीसेन जब से आया है ,खुले में घूमने की उसकी आजादी छिन गई है |
उसके भौकने पर कालोनी की सभ्रान्तता को देखते हुए लगाम लगाए रखना पडता है |वरना लोग हमें असभ्य –देहाती न समझें |
दिशा-मैदान के लिए उसे घर वालों का  मुह ताकना पडता  है |
हमारी पूरी कोशिश होती है कि उसे बुरा न लगे उअसका फील –गुड हिट न हो|
 हमारी तरफ से ,घर के एक  अशक्त को जो  सेवा दी जा सकती है, वही ‘सिसेन’(शेरू) इन दिनों, पा रहा है|बावजूद इसके ,वो बहुत  दुखी है |
उसे इस नए माहौल में अपने सामान –विचार धारा वाले दोस्त की तलाश है | 
सुशील यादव

वडोदरा 

हमारा (भी) मुह मत खुलवाओ


उनको मुह बंद रखने का दाम मिलता है |कमाई का अच्छा रोजगार इन्ही दिनों इजाद हुआ है|
सुबह ठीक समय पर वे दफ्तर चले जाते हैं |खास मातहतों को केबिन में बुलवाते हैं ,प्यून को चाय लाने भेजते हैं |गपशप का सिलसिला चलता है|
केदारनाथ के जलविप्लव,लोगों की त्रासदी ,बाढ के खतरे ,सरकार की व्यवस्था-अव्यवस्था ,देश में हेलीकाफ्टर की कम संख्या ,सब पर चर्चा करते लंच का समय नजदीक आने पर, एक-एक कर मातहत खिसकने लगते हैं|
अंत में शर्मा जी बच पाते हैं ,वे उनसे पिछले सप्ताह भर की जानकारी  शाम की बैठक का दावत देकर ,मिनटों में उगलवा लेते हैं |
शर्मा जी की दी गई जानकारी, उनके लिए,एक मुखबिर द्वारा ‘ठोले’ को दी गई जानकारी के तुल्य होती है |
वे इसे पाकर अपनी पीठ थपथपाना नहीं भूलते |
वाहः रे मै ? वाले अंदाज में वे साहब के केबिन की ओर बढ़कर, ‘नाक’ करते हैं | वे ‘में आई कम इन सर’ की घोषणा इस अंदाज में करते है जैसे केवल औपचारिकता का निर्वाह मात्र कर रहे हों वरना  साधिकार अंदर घुस कर कुर्सी हथिया लेना उनका हक है | और ये हक उंनको, साहब को ‘वैतरणी’ पार कराने का,  नुस्खा देने के एवज में सहज मिला हुआ है |
साहब आपत्ति लेने का अपना अधिकार मानो  खोए बैठे हैं,वे पूछ लेते हैं ,कैसा चल रहा है ?उनके पूछने मात्र से, वे शर्मा जी वाला टेप स्लो साउंड में चला देते हैं|साहब जी क्या कहें ,सारा स्टाफ करप्ट है|
वे स्टाफ के साथ –साथ ,साहब को भी जगह-जगह लपेटने से बाज नहीं आते |
साहब, पेंट की जेब से रुमाल निकाल कर ,पसीना पोछ-पोछ कर ,घंटी बजाते हैं ,प्यून  के घुसते ही कहते हैं –थोड़ा ए .सी .बढाओ |
ए.सी. से राहत पाकर वे पूछते हैं ,कोई खतरा तो नहीं है ?
सी.बी.आई. वालों से तुम्हारी कोई पहचान नहीं निकल सकती क्या ?
यों करो इस हप्ते इसी अभियान में लगे रहो ,देखो किसी से कुछ कहना मत ,बिलकुल चुप रहना |
तुम्हारा पहुच जाएगा..... |
वे इत्मिनान से आफिस की गाडी ले के अपनी फेमली ट्रिप में दूर निकल जाते |शर्मा जी को खास हिदायत दे के रखते कि मोबाइल स्विच आफ न रखे |
उनका तर्क है कि कौन कितना खाता है ,कब खाता है ,किससे खाता है ,इतनी जानकारी आपके पास हो, तो आप अच्छे-अच्छो को हिला सकते हैं |
वे इसे समाज सेवा के बरोबर मानते हैं |
आपके नजर रखने मात्र से कोई अगर इस राह का राही नहीं बनाता तो हुई न देश की सेवा ?
वे वापस आकार दिल्ली ट्रिप का, जुबानी खर्चा-बिल साहब को बता जाते हैं|
वे साहब  पर भारी पडने वाले अंदाज में कहते हैं ,फिलहाल सर आप फाइल-वायल  को ठीक–ठाक कर लें|
दो-चार ठेकों को बिना लिए निपटा दें|आपकी छवि बनेगी |घर में नगदी वगैरा न रखें तो बेहतर होगा |बेनामी के कागज़-पत्तर को ठिकाने लगा ले|पता नहीं वे कब आ धमकें ?
साहब जी प्यून को बुला के ए.सी. बढ़वा लेते हैं |

वे साहब जी पर एहसान किए टाइप ,अपनी कुर्सी पर आकार ,स्वस्फूर्त फुसफुसाते हैं,बहुत अंधेरगर्दी मची  है पूरे दफ्तर  में | सुशील  यादव     

लाल बत्ती वाले लोग


       हम लोग निपट देहात में रहा करते थे |सुविधा के साधन कम हुआ करते थे | न रेडियो न फोन |
पचास साल पहले ,टी वी ,मोबाईल के बारे में कोई जानने की सोच भी न सकता था |
मास्टर जी गाव के सर्वेसर्वा सुचना व् प्रसारण का काम सम्हालते थे|
वैसे उस जमाने में रोज की दिनचर्या में, खबरों की  कोई जगह नही थी |लोग कमाने निकलते थे ,दिनभर की रोजी में थक हार के लौटते |अन्धेरा घिरते ही पूरा गाव सो जाता था |अब ऐसे में खबर्रो का भला क्या अचार डालते  ?
       खबरों से ज्यादा,गांव में किस्से-कहानियों का प्रचलन था|चौपाल में कहीं दुबक के बैठ जाओ तो पिछले चालीस –पचास सालों का इतिहास समझ में आने लगता |कैसे १०० रु में तोला भर सोना,एकड भर खेत |
पन्द्रह रु महीने की पगार  और चार आने की तरकारी  में बड़े से बड़ा परिवार आराम से जीम  लेता था |उस जमाने में किसी  सी ए ,पी ए की पैदाइश नही हुई थी , कोई तहलकेदार  इकानामिस्ट नही हुआ करता था  |
       बुजुर्गों की पूछ –परख वाला वो जमाना धीरे –धीरे मनो लद सा  गया|
मास्टर जी को देख, पेशाब कर देने वाले लोग अब लाल बत्ती लगाए घूमने लगे |किस्सा कुछ यूं है ;
कंछेदीलाल और मै साथ-साथ पढते थे |
वो एक कमजोर सा दुबला –पतला ,स्कूल से हमेशा गोल रहने  वाला, या यूँ कहें कि मास्टर जी के  डर से स्कूल से दूर –दूर भागने  वाला, कम अकल का साधारण सा बालक था |वो मेरे ठीक पीछे बैठता था |उसकी अनुपस्थिति का खामियाजा मुझे झेलना होता था |मास्टर जी उन दिनों के रिवाज के मुताबिक उसे बुलाने ,उसके घर मुझे भेज देते |कभी मिलता तो उसे पकड़ लाता |वरना मुझे भी पढ़ने से कुछ राहत मिल जाती| स्कूल ज़रा देर से पहुच कर कन्छेदी की जगह –जगह तलाशी का ब्योरे वार विवरण देकर वाहवाही पा लेता |इस बहाने ,मास्टर जी से और भे कई छूट मिल जाया करती थी |
कभी कन्छेदी को लगातार स्कूल आए देखता तो मन ही मन मुझे उस पर गुस्सा सा आया करता था|
कन्छेदी प्राय: हर क्लास में मेरे करीब ही बैठता |उसे अघोषित रूप से मेरे स्लेट –कापी से देख के लिखने की आदत सी थी |
एक दिन खराब तबीयत के चलते मैं स्कूल नहीं जा सका |कन्छेदी पर आफत आ गई |मास्टर  जी, परीक्षा की तैयारियों करवा रहे थे ,कंन्छेदी सब गलत कर बैठा |मास्टर जी बौखला के दो-चार जमा दिए|कन्छेदी मूत मारे था |क्लास के उत्पाती बच्चो के लिए कन्छेदी को चिढाने का नया जुमला मिल गया |उसका नया नामकरण ‘मुतरा’ हो गया| सहपाठी उसका जिक्र आने पर इसी नाम से जानने लगे थे ,मगर सीधे उसके मुह पर कोई नहीं कह पाता था |
कन्छेदी का, मास्टर से डर का पारा यूँ  बढ़ गया कि  ,वो परीक्षा तक तो स्कूल ही नही आया |
आगे के क्लास में हमारे सेक्शन बदल गए |
कन्छेदी का पढाई से इतना ही वास्ता था कि वो पास हो जाया करता था|
उसकी दोस्ती मोहल्ले के एक –दो पहलवानों से हो गई | पहलवानी में उसका जी क्या लगा , देखते –देखते उसकी काया बदल गई |मस्त सांड की तरह बदन का हर हिस्सा गुब्बारे की तरह तन गया |
कन्छेदी मोहल्ले के टपोरियों का उस्ताद हो गया |टपोरी उससे संगत बढ़ाने के लिए हमेशा घेरे रहते |पान की दुकान , सेलून , चौराहे पर चाय-भजिए के होटल में उसका जमवाडा या  पाया जाना लगभग तय रहता था |उसके खबरी आ-आ कर गाव ,मोहल्ले,पडौस की खबर उसे पास-आन किया करते थे | उसे गाँव की हिस्ट्री-जिओग्राफी ,बच्चे से बूढों तक की सेहत,यहाँ तक कि, जनानी बातों  की जानकारी भी उसे मिल जाती थी|
उसके तजुर्बे दिनों-दिन बढ़ रहे थे |नौकरी की उम्र में पहुँच कर बहुत हाथ पैर मारे ,मगर मार्क-शीट देख सब मुह फेर लेते थे |यों नौकरी के नाम पर बस  खाली जूता घिसना ही हुआ|
हताश हो कर कन्छेदी से बैठा न रहा गया |उसके टपोरी –विंग ने पैसा कमाने के कई नुस्खे बताए |कन्छेदी कन्विंस न हो पाया |बस आखिर में उसे दलाली वाला आइडिया ही जमा |इसमे जोखम कम ,लागत कम और जब तक दिल करे , काम करो वाली बात ने , उसे अट्रेक्ट किया | उसकी दलाली जम गई |कई लोग संपर्क में आते गए |सुझाव दर सुझाव ,सलाह-दर सलाह  करवट बदल –बदल के,  कन्छेदी गाँव का मुखिया , सरपंच , जिला पंचायत का अध्यक्ष ,विधायक और अंत में मंत्री तक बन गया |
कन्छेदी की तरक्की के ग्राफ को, किस्से कहानी की जुबानी कहे तो, जैसे उनके दिन फिरे वाली बात हो जाती है |हम लोग इसे किस्मत का नाम देकर,बस ठंडी आहें भर लेते हैं |जलने-भुनने –कुढने की बात नही होती वरन  कन्छेदी जैसे ‘लो आई-क्यू’ वाले लोग कहीं  कम  नही पाए जाते |
कन्छेदी की मिनिस्ट्री ठाठ से चल रही है |कछेदी के विचार –व्यवहार में जमीन –आसमान का फर्क आ गया है|वो तोल-मोल के अच्छा बोलने लगा है|किसी दार्शनिक के बतौर तर्कसंगत बातें सुन कर गाव वाले,उसे  अगला और उससे भी अगला चुनाव अवश्य जीता देंगे |अभी तक तो यही माहौल है |
कई सालो बाद, मेरे नाम से मुझे ढूढते-ढाढ़ते मास्टर जी आए |कहने लगे ,तुम्हारे दोस्त कन्च्छेदी से ज़रा काम था |मैंने कहा मास्टर जी आपने तो उसे भी पढ़ाया है |मास्टर जी कहने लगे- हाँ , मगर सीधे –सीधे कहना जमता नहीं |मेरे बेटे का ट्रान्सफर दूर के देहात में हो गया है सो उसे रुकवाना है , ये उन्ही के मंत्रालय का काम है वे शिक्षा –सचिव साहब को बोल देगे तो तुरंत काम हो जाएगा |मास्टर जी की कातरता से मुझे लगा कि गुरु-दक्षिणा का मौक़ा बिन मांगे मिल गया है |मै उॠण होने की तैय्यारी में लग गया |
वैसे मेरी मुलाक़ात कन्च्छेदी से कई सालो से नही हुई थी |मुझे खुद नहीं मालुम कि वो मुझे कितना वजन दे पाएगा  ?मगर मास्टर जी ने पहली बार किसी बात के लिए कहा  है तो इंकार की कोई गुंजाइश भी नही थी ,वो भी तब जब मास्टर जी गाँव से चल कर राजधानी मुझसे मिलाने आए थे|मैंने कहा चलिए |काम हो जाएगा |मास्टर जी स्कूटर पर पीछे बैठ  गए |
कन्च्छेदी का भव्य मंत्री वाला बंगला ,सेक्युरिटी ने रोका ,गांव का वास्ता देने पर जाने दिया |आगे पर्सनल सेक्रेटरी  ने कई सवाल दागे|कहने लगा ,सब गांव का रिफरेंस दे के मिलने चले आते हैं साहब का बहुत  टाइम खोटा होता है|आप लोग पहली बार दिख  रहे हो |
मैंने पी.एस.से मास्टर जी से परिचय कराया , अपने को उसका अभिन्न मित्र बताया |सेक्रेटरी ने कहा साहब गुस्सा होते हैं |हर किसी को मत भेज दिया करो |
मेरे कहने पर, कि आप ये चिट भेज भर  दो |नहीं मिलते तो हम गाव में मिल लेंगे |सेक्रेटरी राजी हुआ |चिट के जाते ही बुलावा आ गया |
कन्च्छेदी के कमरे ,उसकी बैठक, उसका रोब-दाब, ठसन देख कर पहली बार यों  लगा कि मै अपनी स्लेट–कापी कन्च्छेदी से छुपा लूँ ,उसे बिना मेहनत के सब सही हल  क्यों मिले ?
मेरे सहज होने से पहले कन्च्छेदी ने बहुत उत्साह के साथ हाथ मिलाया , मास्टर जी को प्रणाम किया |इधर-उधर की बातें हुई |उनके पास आने के बारे में हम बता पाते इससे पहले दो –चार फोन आ गए |उनकी व्यस्तता थी |वे कुछ सुनते , कुछ फाइल उलट-पुलट लेते |स्टेनो को बुला के हिदायत देते| सहज होने की कोशिश करते –करते वो हांफने लग गया | बस एक मिनट , बस दो मिनट, बस हो गया , की बात दुहराए जा रहा था |
उसे एक छोटा सा  अंतराल मिलते ही , मैंने आने का मकसद, एक सांस में कह सुनाया |मास्टर जी खामोश श्रोता की तरह मेरी बात में सर हिलाते रहे | मेरी बात पूरी होते ही , कन्च्छेदी कुर्सी से उछल के खड़े हो गए , वे सीधे बाथरूम में घुस गए |निकलने के बाद उनके चहरे पर एक ताजगी दिख रही थी |
मुझे मास्टर जी की,स्कूल के दिनों में  कन्च्छेदी  की, की गई  कथित पिटाई का ख्याल आ गया |मैंने बेखयाली में मास्टर जी की तरफ  देखा|मास्टर जी बेखबर दिखे ,उन्हें शायद याद भी न हो |सैकड़ों को पीटे हैं|मेरे जेहन में एक जुमला मन ही मन उतर गया ‘मुतारा’ |मुझे हँसी आते –आते रह गई |
कन्छेदी बाथरूम से आ कर फोन मिलाने में व्यस्त हो गया , शायद  सेक्रेटरी को मास्टर जी के बाबत बता रहा था |
उधर से सेक्रेटरी ने कहा ,सर अच्छा हुआ आपने फोन लगा लिया ,आपको सी.एम्. साहब ने अभी तलब किया है|
वे तत्काल उठ खड़े हुए |फिर बाथरूम गए |
निकल कर सीधे लाल –बत्ती की गाडी से रवाना हो गए |
मुझे लगा ,हो न हो ‘मुतरे’ ने खुद ही मास्टर जी के बेटे का ट्रांसफर किया हो | 
­­*****  


सुशील यादव

सम्भावना की खोज


वे ढूंढने में माहिर हैं ,खोजने में उस्ताद |
ढूढने और खोजने की प्रबल  प्रवित्ति के बल पर हम आज  कहाँ से कहाँ पहुच गए? आगे कहाँ पहुचेंगे कुछ कह नहीं सकते, मगर  हाँ ; कोलंबस अगर अमेरिका नहीं ढूंढता तो हम ओबामा और ओसामा नाम के प्राणियों  से परिचित कहाँ  हो पाते?
अखबारों की बिक्री कम हुआ करती |
हमारे  पडौसी मुल्क को, अमेरिका के बिना ,कर्जा कौन देता? उनकी गाडी खीचने वाला ,खुदा या उनकी नय्या पार लगाने  वाला नाखुदा जाने कौन होता ?
बात उनकी हो रही थी, जो, वाजिब –गैर  वाजिब, हर चीज को ढूढ़ के पैदा करके रख देते हैं |
वो आजकल अपने  खोजी नजरिए के कारण , अपनी पार्टी के थिंक-टेंक बने हुए हैं |
पार्टी को सत्ता-काबिज कराने के हजार नुस्खे हैं उसके पास |
उंनको संभावना तलाश करने  में चुटकी –भर का समय लगता है |
बड़े से बड़ा, नेता के निधन हो जाने पर उसके उठावने से पहले वे सब्स्टीट्युट ढूंढ के रख देते हैं |
मायूस होके यूं कहेंगे ;उनके  निधन से राष्ट्र ने एक सच्चा सपूत खो दिया है, जिसकी भरपाई मुश्किल है |हमें देश को एक नई उचाई पर ले जाना है ,आओ हम युवा नेतृत्व या /साफ-सुथरी छवि वाले किसी  दलित नेता को  उनके छोड़े हुए काम को आगे बढाने की जिम्मेदारी  डाल कर देश को नई दिशा देने की सोचे|वे, साफ दलित या युवा की तरफ इशारा कर के खिचड़ी पका चुके होते हैं |  
उनमें खासियत है; कि उनका आदमी लाख घोटाला कर आयें  वे उसे देश के हित  में सच्चा साबित कर  देते हैं |इतना ही नही, किसी विपक्षी-नेता  की साजिश करार देके, वे घोटालेबाज को हीरो साबित करने में एडी –चोटी एक कर दिए होते  हैं |
  वे योजनाओं का अक्षय –भण्डार लिए फिरते हैं | आदमी को काम बाटने में उनके मुकाबले कोई नहीं ठहरता |
कब कौन, पद यात्रा कर के वोट बैंक बढ़ाएगा ?
किसको मंदिर के मामले में कितना बोलना है ?
कौन जल के बटवारे ,हवा के प्रदूषण,किसान की जमीन ,मजदूर के पेट को नाप कर हंगामे दार हो सकता है वे अच्छी तरह से जानते हैं |
कौन, सत्ता-पक्ष के, किस नेता की मुखालफत, छीछा –लेदर का काम देखेगा ?कौन कब चुप रह के तमाशा देखेगा ये सब उनके एजेंडे का कमाल होता है |
वे हवा बनाए रखने के लिए ,दूसरी तमाम पार्टी के चुनावी घोषणा –पत्र पर पी.एच .डी. किए रहते हैं |
किसने वादा निभाया, कौन मुकरा? वे सभी को, जनता के सामने बे-लिबास करने में पारंगत हैं |
लेपटाप, टी.व्ही. देने वाले ,गरीब को एक रूपए में चावल ,पाच रु में भरपूर खाना ,स्कूली शिक्षा मुफ्त ,स्कूल में खाना ,किताब-कपडे सब मुफ्त  ,किस्सा-कोताह ये कि आप केवल बच्चे पैदा कर दो आगे सरकार देख लेगी |
उन्हें  इन्ही फार्मूलों को, ‘राजनीति की गीता’ के बतौर लेकर पढते -बढते देखा गया  हैं|
वे बी.पी.एल वालों को कम से कम चुनाव होते तक भूखा-नंगा किसी कीमत पर बर्दाश्त नहीं कर सकते |
उनका बस चले तो वे अपनी  चमडी के जूते बी.पी एल वालो के पाँव में डाल दें|
अपने एजेंडे में , सेक्युलर होने का दम भरना, वे उसी तरह जानते हैं जैसे एक बेजान हिन्दी –फ़िल्म की स्क्रिप्ट पर सलीम और  जावेद को बुला कर दमदार डायलाग डाल दिया जावे |माइनोरिटी के नाम पर   उनको लगता है ,दस-पांच सीट की गुन्जाइश कर दो ,भाषण में एक –दो पैरा  डाल दो वे खुश हो लेंगे |वोटो का अंबार लग जाएगा |इतना कर के , वे इस तरफ से चिंता-मुक्त से नजर आते हैं |
उनके बारे में कहा जाता है कि ,वे सपना कभी नही देखते |पार्टी –जन उनके बहकावे में, देखे हुए सपनों को आ-आ के बताते हैं |उन्हें लगता है सब प्रभु इच्छा के बाद उनकी मर्जी से ,उनके  लिए हो रहा है |वे मंद –मंद मुस्कुरा लेते हैं|
बेचैनी कभी ज्यादा हो जाती है तो वे रामलीला मैदान की तरफ बिना किसी को बताए चल देते हैं |पब्लिक के सामने शपथ ग्रहण करने की, इससे अच्छी जगह उंनको कोई नजर नही आती |

सुशील यादव

 एक वाजिब अंत की तरफ ....
       उसे पार्टी बनाने का शौक अचानक पैदा हुआ | हम लोग ये अंदाजा लगा नही पाए |रिटायरमेंट के बाद सोचते थे ,वे , थैला लेकर बाजार से घर ,घर से बाजार वाले आम आदमी हो  जाएंगे | अचानक उन्होंने धमाका किया |हम लोग समझाए ,बाबू जी ये आप को क्या हो गया  ? (सठिया गए हैं आप )  इतना आसान नहीं है नेतागिरी |
वे भडक गए |
हम लोगो ने कहा , आप  ढंग से बात भी कहाँ कर पाते हैं ? पिछली  बार शादी में गए थे , कितनी फजीहत हुई थी| आपने घराती-बराती किसी को नहीं छोड़ा, सब से अपनी बात मनवाने में लगे रहे |आजकल कौन सुनता है किसी की ?
 अपने  समधन को ठीक से जवाब भी नहीं दे पाए | किराने की दुकान , बस स्टेंड ,धोबी , नाई कहाँ हंगामा नहीं करते ?kanha 
 कौन बचा है  जिनसे आप का झगड़ा नहीं होता? सब से तू –तू ,मै –मै  किए रहते है |
 केवल मोहल्ले में जोड़ के भला बताओ आप कितने वोट बटोर पाएगे ? पार्षद का चुनाव भी तो आप जीत नही सकते ,  पार्टी बनाने चले   |
हमारी बातें उन्हें सुई की तरह चुभी  |
वो और भी  भडक गए |
झल्लाते हुए बोले , तुम लोग मेरा पीछा छोडो , मुझे जो करना है सो करना है | पार्टी तो बन के रहेगी |
यहाँ सब ऐरे – गैरे  पार्टी बना रहे हैं | शुक्ला को देखो पोस्टर- बेनर की बोलते रहता है , खोरबहरा-बिसाहू  की नई पार्टी बन गई , साहू  मजे में है , चार -चार  पार्षद  बिठा लिए देखते -देखते | आज सब अपने –अपने लोग जगह –जगह फिट किए जा रहे हैं ,अपनी टेक्सी चलवा रहे है | कल ट्रांसपोर्ट कम्पनी  के मालिक बने  मिलेगे | तुम लोग बस देखते रह जाओगे |
       हमारी तरफ से तर्क दिया गया ,पर बाबूजी सब के बैक ग्राउंड होते हैं
|या तो वे समाज सेवक होते हैं ,या समाज से सेवा लेने वाले होते हैं |
मोहल्ले –पडौस में दादागिरी किए होते हैं |नजूल की जमीन घेरने वाले दबंग होते हैं |अफसर –बाबू को धौस देने वाले टपोरी किस्म के लोग होते हैं |कोई डाक्टर –इंजिनीयर नेतागिरी के लिए कहाँ घूमते फिरते हैं |वे लोग कालिज में एक –एक क्लास आसानी से पास नहीं किए होते |कई किश्तों में ,ले-दे के ,पार किए रहते हैं |इतमिनान से रहने वाले ,हरेक कदम दुश्मन को जवाब देने के लिए उठाने वाले लोग राजनीति में फिट हो पाते हैं |इनके पास कट्टा -तलवार -चैन क्या नहीं होता ,आपके पास तो एक चाक़ू भी धार वाला नहीं है| फिर ?
 आप का क्या है ,छोटी –छोटी बात पे बहस –तर्क किए रहते हैं |ये सब कहाँ चलता है|यहाँ तो अच्छे को बुरा और कभी –कभी बुरे को अच्छा कहना पडता है |रीढ़ की हड्डी को जो जितना लचीला बना ले वही परफेक्ट है यहाँ |
समझदारों की ,सीधे –सादो की ,पढ़े –लिखों की यहाँ जरुरत ही नहीं है |
आप क्यों नाहक अपनी टांग फंसा रहे हैं|
बाबूजी , वाक्य के हर शब्द को पकड़ कर लटकने में माहिर हैं |
वे टांग पर लपक लिए |
कहने लगे –आज अगर कहीं  टांग नहीं फसायेंगे तो कल को दूसरे हम निकम्मो की बस्ती में आ घुसेंगे |
अंग्रेज भी ऐसे ही आए थे | इसी निकम्मेपन के चलते गोरे हमारे घरों तक घुस लिए |हम लोग सोते रहेंगे तो हमारा देश फिर से  सो जाएगा|
वे देश को जगाने के चक्कर में हम लोगो की नींद हराम करने में लग गए |
एकला-चलो के अनुयायी बाबूजी को किसी सपोर्ट की जरुरत नहीं पडी |वे अपने अभियान में जुटे रहे  |
उनका रिसर्च विंग, उनका ‘दिमाग’ खुरापात में लग गया |वे कागज़ कलम लेकर बैठ गए |
उन्होंने समाचार पत्रों को अवगत किया ,पिछले दिनों नगर में एक नई राजनैतिक पार्टी ‘धरती विकास पार्टी’ का गठन किया गया |जिसका उद्देश्य धरती को लादेन मुक्त ,नक्सल मुक्त ,आतंक मुक्त,भ्रस्टाचार मुक्त ,महंगाई मुक्त  करना है | ‘मुक्ति-धाम’ वाला पहला वक्तव्य समाचार-पत्रों में छप गया |
वे उत्साहि़त हुए |उनकी बयान-बाजी चलते रही | दो-चार लोग उनसे बतियाने लगे |वे छोटे छोटे भाषण भी करने लगे |तमासे की शकल में मजमा लगने  लगा |
बाबूजी सियासती ख्व्वाब में खोते चले गए |
हम लोग भी ,ये सोच कर कि उनको बिजी होने का मकसद मिल गया चुप से हो गए |
वे अखबार इस गंभीरता  से पढ़ने लगे मानो कल एक्जाम की तैयारी कर रहे हों|
वे राष्ट्रीय-अंतर-राष्ट्रीय मुद्दों पर अपने विचार व्यक्त करने लगे |
यों तो वे पहले भी इन  पर बोलते थे ,मगर हम तव्वजो -वजन नहीं देते थे |
अब डाईनिग टेबल पर ,हम पर वे भारी पडने लगे |
बाबूजी ने बौखलाने पर लगाम लगाने की प्रेक्टिस करने लगे |अपने पेंशन की रकम अपनी पार्टी को समर्पित करने में वे व्यस्त हो गए  |
दफ्तर खोल लिया |
दूसरी पार्टी के बुलावे पर वे जाने लगे |
मुद्दों पर समर्थन देने की परंम्परा का उन्होंने निर्वाह भी बखूबी किया  , वे एक पार्टी के अनशन करने के प्रस्ताव पर राजी हो गए |
हम लोगो ने खूब समझाया ,देखिये , आप बी.पी. ,शुगर वाले हैं |आपको ये सब नहीं करना है|
मगर बी.पी.-शुगर उनके अनशन –जिद के आड़े आ नहीं पाया |वे बैठ गए |वे लगभग नेता बन गए थे  |
अनशन का पहला दिन उत्साह से  गुजर गया |दीगर पार्टी वालो  ने उन्हें उकसाया, बाबूजी , एक दिन और कर लो | बात बन जाएगी |वे मान गए |
पुलिस वाले भिन्नाए-बौखलाऐ बैठे थे  |वे एकाएक ,उठा-पटक में उतारु हो गए |डंडे चले |कार्यकर्ता भाग निकले |पुलिसिया अंदाज में  बाबूजी भी खाए ,  बंद भी कर दिए गए  |
वो तो हम लोगो की तत्परता थी , आनन् -फानन  जमानत करवा लिए |
अब ,आए दिन  बाबूजी पेशी में कचहरी –वकील से मिलते रहते हैं |करीब-करीब उनके दिमाग से भूत उतर सा गया है , अखबार आए पडा रहता है ,वे देखने –पढ़ने में जी नहीं लगा पाते |
मगर आज भी बाबूजी , देश की दुर्दशा पर अक्सर दुखी होते रहते हैं |
सुशील यादव 

मेरे हिस्से का (सर) दर्द
इस मायावी संसार में जो आया है वो अपना –अपना सर और अपना –अपना दर्द ले के आया है |कई लोग अपवाद के तौर पर पैदा हो जाते हैं |पैदा होते तो पूरे पुर्जे के साथ हैं मगर किसी- किसी का पुँर्जा, काम के बोझ से,या हैसियत से कहीं ज्यादा मिल जाने पर अनाप-शनाप काम करने लगता है |
मेरे एक साहब हुआ करते थे ,पता नही अब हैं या नहीं ,अगर कहीं जिन्दा  हैं तो भगवान से उनके लिए सदबुद्धि मांग कर उनके घर –परिवार का सरदर्द बढ़ाना नहीं चाहता |
अजब खब्ती किस्म के सरके हुए से थे |उनसे एक कागज पर दस्तखत कराना मानो एक जंग जीतने के बराबर था |अपने को अंगरेजी में  शेक्सपियर के बाद का संस्करण मानते थे |
अनुसंधान वाली किसी भी फाइल पर ,छापा मार कर आए अफसरों को वो अनाप-शनाप सवाल पूछते थे कि पहले ही लाख प्रिपेयर  हो के आए रहे हो ,बिखर जाते थे |सर झुकाए अफसरों को वो  , शर्लाक्स होम्स ,और जेम्स हेडली चेईज की तरह, बात की जड में, घुसने की हिदायत दे कर ,ऐसी झिडकी पिलाते थे कि दुबारा केस बुक करने के बारे में सोचे, | कभी तुरंत अपने ड्रोवर से एक कोरी फाइल निकाल कर, अफसर के खिलाप ,अफसर के सामने ,तहकीकात  में खामी गिनाते  खोल देते थे |अनुँसंधान दल की सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाती थी |ये दीगर बात थी कि उन्ही खामियों की आड में वे  ‘पार्टी’ का  शिकार कर लेते थे |
किसी की औकात नही थी कि, वो अपने तजुर्बे ,अपने बल-बूते पर कुछ काम कर लें,या ‘सर’ के अति पर , उपर फरियादी बनकर खड़े हो जाएँ |
बाद में वे.चार-छह दफ्तर के चाटुकार अफसर और  लेडी-स्टेनो से घिर कर यूँ हाँकते थे, देखा कैसे हडकाया?
सब खींसे निपोर कर हिन्हिनाते थे|
साहब के गुड-बुक्स में रहने का सबसे आसान सा तरीका होता है इन चाटुकारों की तरह हिनहिनाना |
तंग करने में वे माहिर इतने थे कि अगले को रुला के दम लें |आपके ब्रांच से टाइपिस्ट,कंप्यूटर-आपरेटर को हटा कर, आपको, पांच सालो का डाटा मांग लेना,ब्रीफ लिखे हो तो थीसिस मांग लेना , थीसिस लिख ले जाओ तो कहें, क्या समझते हो ? उपर वाला  कोई इतना पढ़ने के फुरसत में बैठा है |छोटा करो ,छोटा करो |
वे अपने गोपनीय ब्रांच को, शस्त्रागार समझने में कभी भूल नहीं किए |चार की जगह आठ लोग  बिठा रखे थे |छुट्टियों में बुला कर ,प्रचारित करते थे कि फलां-फलां की फाइल रंगी जा रही है|स्टाफ की नाक में दम कर रखा था | स्टेनगन की जद में कौन कब आ जाए कहा नहीं जा सकता था |   
ऐसो के खिलाप कौन उठे ?
स्टाफ, गंडे-ताबीज बंधवाता ,मिन्नत –मनौती माँगता |उसके ट्रांसफर हो जाने पर भगवान को प्रसाद बदता| आठ घंटे की सरकारी नौकरी के लिए चौबीसों घंटे का बोझ लिए फिरता |  दफ्तर टाइम पे पहुचता |बिना सी. एल. के कोई  गायब नहीं रहता |लेडी-स्टाफ को देख के सर झुका लेता |कोई राजनैतिक बहस नही होती थी |बाबू –अफसर, क्लाइन्ट का काम बिना किसी उम्मीद के निपटा रहे थे |क्रिकेट में इंडिया पिटे या पीट दे सब भावना शून्य से हो गर थे |वे ट्रांसफर एप्लीकेशंस लिख ले जाते मगर देने की हिम्मत न जुटा पाते |एक किस्म की इमरजेंसी लद गया था दफ्तर में |
माहौल से नाराज अफसरों का एक  विद्रोही दल ,आजादी की जंग वाले अभियान  की तरह छुपे-छुपे एकजुट होने लगे|वे एहतियात भी बरत रखते कि कोई भेदिया न घुस पाए नहीं तो लेने के देने पड जाए |
 शुरू-शुरू में एनानिमस कम्प्लेंट करके, एक-दूसरे को  तसल्ली देते रहे | ‘बोर्ड’ में माहौल बनाने का काम जारी था कि पता चला किसी दूसरी जगह के किसी बदनीयती के  लफड़े में साहब को सस्पेंड कर दिया है |
दफ्तर  का बहुत बड़ा ‘सर’अब स्वयं दर्द के हवाले हो गया जानकार ,दफ्तर में मिठाई बंट गई |
मेरे सर से भी रोज उठने वाला दर्द जाता रहा |
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सुशील यादव
एपार्टमेंट ३०७ ,फारले स्ट्रीट ८०५०
ओव्हरलेंड पार्क ,केन्सास ,अमेरिका