Tuesday, 20 August 2013

“रोम वाज नाट बिल्ट इन अ डे” ....


                               

तब अंग्रेजी का अपना एक अलग रूतबा हुआ करता था ,एक सख्त किसम के टीचर हमें पढाते थे ,क्लास में उनके घुसते ही एक वीरानी ,सन्नाटा या सच कहें तो मनहूसियत का माहौल हो जाता था |
पता नहीं उनकी याददाश्त या डिक्शनरी में कम शब्द  या प्रोवर्भ थे .जो आए दिन कहा करते थे ;
रोम वाज नाट बिल्ट इन अ डे......|
इस वाक्य के बोलते समय ,उनका चेहरा एक अलग किस्म के तनाव से भर जाता था ,टीचर जी पढ़ाते पढाते कहीं खो जाते थे |उनकी वापसी तब होती थी जब कोई  प्यून रजिस्टर ले के आता ,या छात्रों की  गपशप की आवाज ऊँची गूंजती  .या स्कूल में पिरीयड बदलने की टन्न बजती |  
मैं उन दिनों अखबार पढ़ लिया करता था, इसलिए मुझे अतिरिक्त ज्ञान हो गया था ,मसलन मै,घपलो-घोटालो, राजनीतिक पहुँच , उपरी लेन-देन , पैसों के लिए बाबू से मंत्री तक के,चारित्रिक स्तर  के बारे में जानने लग गया था |
टीचर जी के उस वाक्य के मायने कि , रोम वाज नाट बिल्ट इन अ डे ..... यू लगता था कि ,रोम चाहे चार दिन में बना हो या चार सौ सालों में ,हमारा क्या वास्ता ? दूसरी बात ये खटकती कि ,रोम के ठेकेदार ,कारीगर ज्यादा  सुस्त रहे होंगे , या  रोम में वो कौम नहीं रही होगी  जो स्पीड- मनीपर विश्वास करती थी ?
शायद रोम में अच्छे ‘बाबू इंजीनियर-नेता’  लोग पैदा होना भूल  गए  थे  ,कि रोमको बनने-बनाने  में बरसो लग गए ?
कौतुहल के और अनेक कारण भी थे ,जो रोम को एक बार देखने की वजह आज भी बने हुए हैं  |
हमारे तरफ की बात अलग है,इधर  आर्डर हुआ नही कि रातो-रात रोमबस जाता है|
पूरी की पूरी राजधानी बन  जाती है |
ठेकेदार ,इंजीनियर जेब  में एक से एक डिजाइन का ‘रोम-रोमियो’ का  नक्शा लिए घूमते रहते हैं |
एक-एक दिन की खबर रहा करती है ,कब केबिनेट की मीटिंग हो रही है ,फाइल किस टेबल तक पहुची है |
किसने रोड़ा डाला|रोड़ा डालने वाले की कितनी औकात है|कितना वजन डालना होगा |कितने तक में मामला सेट होगा |उन तक पहुचने का अप्रोच रोड क्या है?
वो सब के सब  टकटकी लगाए बस ये देखते रहते हैं कि ,कब साहब का फरमान हो , रोम की लेन लगा दें |
स्वीमिंग पुल ,रोड ,नाहर बिजली पानी सब का दुरुस्त इन्तिजाम| मिनटों  में जहाँ कहे रोम-रोम में फिट कर दें |
डिस्काउंट   के बतौर ,मेम साहिबानों के लिए छोटे-छोटे रोम की अलग से भेट | 
कहते हैं ,पैसा बोलता है| इन इन्तिजमो को देख के लगता है ,पैसा लाउडस्पीकर की आवाज भी रखता है .तभी तो इसकी आवाज क्लर्क बाबू . ठेकेदार ,इंजीनियर ,सांसद-विधायक ,मंत्री संतरी सभी एक साथ सुनकर रोम,बनाने में हाथ बंटाते हैं |
कुछ पत्रकार अडंगेबाज होकर , रोकने की मुद्रा में खड़े होते हैं |
नए रोम के बारे में वे  अनाप-शनाप लिखते हैं ,बताते है नया रोम संस्कृति के खिलाप है |कई खामियां गिनाते हैं|
 उधर विधायक विपक्ष , सांसद विपक्ष अकड़े  हुए से आंकड़े फेकते हैं ,थू-थू से माहौल थर्राया सा लगता है |
लगता है ये सब रोम के पाए को कहीं भी , कभी भी जमने नही देंगे |जिस-जिस ने रोम के पाए पर अपना कंधा दिया है , वे उनको ही दफना के डीएम लेंगे |
सरकार सोते  से जागती है ,वो रोम निर्माण में अनर्थ ढूढने की जी तोड़ कोशिश करती है|उंनसे अनर्थ ढूढा ही नही जा पाता| वो थक-हार के निर्णय लेती है ,निगरानी-आयोग के हवाले मामला दे दिया जाए |सरकार के पास और भी काम  है वो अगले इलेक्शन की तैय्यारी में लग जाती है |सरकार की उपलब्ध्दियो में रोम -कथा , कम समय ,कम खर्च में बना हुआ  बताया जाता है | गरीबों से इसे जोड़ते हुए श्रम उपलब्ध कराने का  जरुरी तरीका बताया जाता  है| ये कहा जाता है कि मंनरेगा के तहत काम उपलब्ध कराए गए |पक्ष वालो को वोट की फसल लहलहाते दिखती है |
एक ठेकेदार को मै करीब से जानता हूँ , हमेशा बड़े दुखी मन से मिलते रहे |वो  पर्यावरण ,स्वास्थ्य परिवार-नियोजन ,जेल इत्यादि  सभी मंत्रालयों की विस्तृत जानकारी रखते हैं ,भले वे अपने  लड़के का फोन नंबर भूल जाए. तमाम दूसरो के नम्बर तात्कालिक मौखिक याद रखते हैं |
वे मिल कर , इस बात का रोना रोते हैं ... कि अब की बार अच्छी बारिश हो गई है , नहर  का काम शायद रुक जाए...|बाजार में अच्छे टीके आ रहे हैं लोग बीमार नहीं पड़ेंगे... | अगला सप्लाई आर्डर केंसिल हो न जाए|... बच्चे कम पैदा हो रहे हैं , लोग घरो में दुबक गए हैं ,आगे काम कम हो जाएगा |
मै उनको आश्वस्त कर  कहता हूँ , ऐसा कुछ नहीं होने वाला , यहाँ तुम्हे घबराने की जरूरत नहीं |
 ऊपर से खुद ब-खुद फरमान आएगा ,फलां पुल जर्जर हो गया है ,तोड़ के बना दो,/ कही से मेट्रो निकाल दो , इंटरनेश्नल स्वास्थ्य का हवाला देकर , गरीबो के लिए आलीशान फाइव-स्टार नुमा हास्पिटल बना दो | कसाब की सुरक्षा खतरे में है , जेल को सद्दाम के बख्तरबंद नुमा महल में तब्दील कर दो |
हम उस जगह है जहां काम की कमी ही नही ?
वो एक गहरी सांस में, ‘आमीन की मुद्रा’  लेकर मुझसे बिदा ले चल देता है  |
  मुझे उनसे रोम-टाइप के  कई डिटेल अपडेट मिलते रहने का सिलसिला बरसों तक चला |
मै भी करीब-करीब ठेकेदार जैसा हो गया था |किसी बनते हुए पुल या रोड को देखकर ,घंटों वहीं खड़े होकर , उसके बनाने वालो की हैसियत का अंदाजा लगाने लगता |
निर्माणाधीन –स्थल को देखकर ,यह भी बताने की स्तिथि में रहता कि , फाइल कहाँ होनी चाहिए ?
मेरे तजुर्बे से कई लोग फ़ायदा  उठाने की कोशिश में रहते कोई फ़ायदा उठा भी लेते ,कहते आपकी वहां पहुंच है ,ये काम  करवा दीजिए ,एहसान मानेंगे , वो एहसान से कभी आगे बढ़े नहीं और मै वही का वहीं रह गया...... |
अरे हाँ , टीचर जी का  ‘रोम’ वाला वाकिया  नाट बिल्ट इन अ डे पीछे छुट गया... |बहरहाल , उन दिनों ,हम छात्रो की जुबान में भी रोम चढने लग गया था|बात –बात में हम लोग भी कहने लग गए थे रोम वाज नाट बिल्ट इन अ डे |
हमारी जुबान का ये ‘तकिया-कलाम’ हो ,इससे पहले, भला हो  हमारे  क्लास के, विवेक नाम के एक लड़के का, जिसने पता लगा कर बताया कि ,यार अपने अंग्रजी वाले सर जी कई दिनों से अपना मकान बनवा रहे हैं | सस्ताहा टाइप ठेकेदार मिस्त्री को काम दे रखे  हैं| किसी के पास पूरा सेंट्रिंग-मटेरियल नहीं तो कोई मजदूर होली मनाने गया तो लौटा नहीं| काम कई महीनो से रुक-रुक कर धीरेधीरे चलने से टीचर जी परेशान  से रहे|  कर्जा भी ख़ूब हो गया, लगता है | मगर हाँ , गनीमत समझो , कल छत की ढलाई हो गई |शायद टीचर जी अब चैन की सांस लें|अब रोम के बनने –बिगड़ने का असर उन पर न पड़े |और सच ही ,वो उसके बाद ‘रोम-विहीन’ हो गए |
हम ‘रोम’ की गली से गुजर कर कब अगली क्लास में पहुँच  गए ? पता ही नहीं चला |.


सुशील यादव;केन्सास ,. अमेरिका

२२.१०. १२

गंगू तेली की दहाड़



       गंगू तेली को उसके कुछ साथियों ने ये मुगालता दे दिया कि उसमे ‘राजा’ बनने  का पूरा ‘मटेरियल’ है|
कुछ एक साथी विरोध और मुखालफत भी करते रहे |एक तरफ खामियां ढूढने वाले उसके विरोधी गुट के लोगों ने खामियों का इतिहास खंगालना जोर-शोर से चालू कर दिया | तो दूसरी तरफ खूबियां भी ढूढ़ी जाने लगी |
उसके जमाने के गुरुजनों की तलाश हुई जिससे उसका ‘पास्ट’ लोगों को परोसा जा सके |
बहुत मुशक्कत के बाद एक जर्जर हालत में, प्रायमरी स्कूल का मास्टर जी मिला |
       मास्टर जी को, फ्लेश-बेक  में ले जाने का प्रयास किया गया |वो अपना सर धुनता |गंगू तेली ....गंगू तेली .......?ऊ हूँ....... याद नहीं आ रहा है |
       कोई बताता ,गुरुजी ..... वो समझू तेली का बेटा |
समझू तेली ...समझू..... ?मास्टर  जी सर को धुनते ......नई भइ नई .......याद नहीं आ रहा है |
       मीडिया वालों को ये धुन सवार हो गया कि मास्टर जी को गंगू तेली की हिस्ट्री याद करा के  दम लेंगे |
वे बकायदा न्यज बुलेटिन में ब्रेकिंग न्यूज देते रहे |
-“मास्टर जी को गंगू तेली के  बारे में कोई जानकारी नहीं या वे जानबूझ कर जानकारी नहीं देना चाहते ?
-बकायदा चार-पांच गपोड़ियों को चेनल वाले पकड लाते और चेनल पर बहस करवाते |
मीडिया के इस  ब्रेकिंग न्यूज से नित नए  चेनल वाले प्रभावित होते रहे|
उनमे होड होने लगी ,हमारे  चेनल ने सबसे पहले मास्टर जी को पकड़ा है |
लोग मास्टर जी के घर के सामने सुबह से इक्कठे होने लगते  |खोमचे वाले ,चाय की गुमटियां खुल गई |हर शख्श ,गुरुजी के बयान का प्रत्यक्ष गवाह बनाना चाहता था |
कृशकाय मास्टर जी ने, कभी जिंदगी में, इतने बड़े हुजूम की कल्पना, सपने में नहीं की थी |
वे सोचने लगे ,सावित्री अगर आज ज़िंदा होती, तो देख के दंग रह जाती |जिंदगी भर ‘मास्टरनी’ होने के अपने भाग को कोसते रही बेचारी | उसकी याद में मास्टर जी ,उसकी फोटो के सामने पुलकित से होते  |आँख  के एक कोर में  अपनी उगली रख के,जमा, लुढकने वाले आंसुओ को रोककर, एक ठंडी आह भर के,मास्टर जी  सोचते , इस भीड़ को गंगू तेली का क्या इतिहास बताऊँ ?
आज अगर इतिहास बता देता हूँ तो कल ये फुर्र हो जायेंगे |मगर बताना तो कुछ न कुछ तो पडेगा ही |
गंगू तेली ,वल्द समझू तेली ,इस नाम का एक लड़का पढता तो था |
वे गणित पढाते थे ,बच्चो का मनोविज्ञान जानते थे ,अखबार ,टी व्ही,पढ़-सुन के सामाजिक सारोकार वाले भी हो गए थे, इसलिए मनन –चिंतन करके गंगू तेली का पच्चास साल पुराना, अपना स्टूडेंट –नुमा स्केच बनाने में लग गए |
स्केच बनाते वक्त वे आज के गंगू तेली को ध्यान में रखना नहीं भूले|
गंगू तेली ,एक दुबला –पतला ,इंट्रोवर्ट किस्म का लड़का था |पढ़ने में तेज ,कुशाग्र बुध्धि थी |जो भी एक बार सिखा दो ,अच्छे से सीख जाता था |उसे गलत बाते बर्दास्त नहीं होती थी |वो अपने हक के लिए किसी से भी अकेले भिड जाता था |उसमे नेतृत्व की अदम्य क्षमता थी |अपना होमवर्क अच्छी तरह से करके आता था ,यही उसकी खासियत थी |उसे दीगर बच्चो को चैलेन्ज देते कई बार देखा गया था |उसकी चेलेंज देने की आदत के चलते एक बार उसके पिता समझू को स्कुल आना पड़ा |वे वचन दिए कि अगली बार उनका बेटा कोई शैतानी नहीं करेगा |प्रधान पाठक उनके आश्वाशन पर बमुश्किल विश्वास कर सके थे |
गंगू तेली को ‘माडल’ बनाने का शौक था वो अपने धुन का पक्का था |बाद में पता चला कि वो अपने बनाए माडल पर फक्र करता था |
तात्कालिक भाषण में , एक बार ‘मेरे सपनों का ‘राज’ ’ में ,गंगू तेली ने राजा जी की बखिया ही उधेड़ दी थी |
उसके बाल-मन में शायद ,जो बाते रही, वही, आज दहाड़  बन के सुनी जाती है ,वे चैलेन्ज दे के कहते हैं ;
सुनो राजाजी ,आपके राज में ,खजाना  लूटा जा रहा है ?कुछ खबर है आपको ?
आपके राज में ,गरीबों को सपना दिखाया जाता हैं|वोट पाने के लिए लेपटाप बांटे  जाते हैं |
आप अपने ‘पूर्वजों की शिकार-गाथा’ बताते नहीं अघाते| मगर आप एक पडौसी की धमकी से दुम दबा के बैठ जाते हैं ?पडौसियों को हड़काते क्यों  नहीं ?
आपके राज में आपके मंत्री ,फूल  रहे हैं,आप इंनका ईलाज क्यों नहीं करवाते ? आपने मर्ज को जानने की कभी इच्छा जाहिर की है ?क्या ये मंत्री ‘ओव्हर-डाइटिंग’ के शिकार हैं |आपने ऐसे  मंत्री को कभी डाक्टर के पास भेजने का कष्ट किया है ?
आपके राज में ,लोग प्याज को तरस रहे हैं |आप उन्हें बिना प्याज आंसू दिए जा रहे हैं |आपके किसान नरेगा ,और कम कीमतों में मिले अनाज से आलसी हो गए कि उन्हें फसल उगाने की सुध नहीं ,या आप अपने राज का माल दूसरे राज में भेज पैसा कमा रहे हैं?
राजा जी सुनो |जनता हिसाब मागती है |पिच्छले दस सालो से आपने किया क्या है ?राजमहल कि सडक के मरम्मत के अलावा आपने कोई सडक पर ध्यान  दिया है ?
राजा जी ,एक ही परिवार के गुण गाने के दिन लद गए |जनता पुराने घिसे रिकार्ड को सुनना पसंद नहीं करती |
ऊ... ला.... ला.... के जमाने में आप केवल ला ला करते रहेगे, ये अच्छी बात नइ है ........
सुशील यादव








चरित्र आस-पास के......


जिसे लोग नरेंद्र महाराज के नाम से  जानते हैं ,वो हमारे लिए मात्र नरेंद्र या अरे –अबे शर्मा था |
साथ में पढने वालो के नाम, बिना अरे , अबे ,स्साले के कहो तो बहुत बुरा लगता है |
कभी-कभी ठीक –ठीक नाम से बुला दो तो लगत्ता है ,बन रहे हैं |
कई बार स्तिथी बदल भी जाती है |कई इतने हैसियत वाले हो जाते हैं कि लगता है, कम बात करे तो ही अच्छा है |
मेरे  मित्रों में से एक  जज , एक कालिज का  प्रिंसिपल , एक मंत्री , एक सांसद,एक पंडित बन बैठा है |मेरी हैसियत मात्र एक ठेकेदार तक की है |इंजिनियरिंग करने के बाद सोचा नौकरी क्या करना . अपना ही कुछ किया जावे ,सो ठेकेदारी शुरू कर दी |
कभी –कभार पुराने, हैसियत वाले दोस्तों से  मिलना हो जाए, तो वे मजे से कह देते हैं , क्या सुशील , कैसा है तू ?
मुझे लगता है जवाब दू , अच्छा हूँ स्साले , तू बता ,तू कैसा  है ? मगर मै मुश्किल से दुविधा में  सकुचाए हुए कह पाता हूँ , अच्छा हूँ  भाई ,आप कहो क्या चल रहा है ?
ये सब वो लोग हैं जो मेरे नोट्स लेकर ,मेरे बताए नुस्खो ,तरीको को आजमा-आजमा के आज हैसियत वाले हो गए |
इनकी ऊँची आवाज में अब वो दब्बूपन जाने कहाँ खो गया ,जिसको निकालने के लिए हमने इनको रेगिंग कैसे करना है , सिखाया था |
कालिज के वो अजीब से दिन थे |पिकनिक –पार्टी मेरे बिना या तो बनाती  न थी या इसके आयोजन की कोई सोचता भी न था |
लडकियां जो अब शादी -शुदा हो अपने –अपने ठिकाने लग गई ,उनको बीच में लाने का ,अब बनता नहीं , वरना कई किस्से इन साहबानो के साथ जुड़े थे |
इन-दिनों जब ये मुझसे मिलते हैं , सीधे –सीधे पूछने में उनको हिचकिचाहट सी महसूस होती है ,वो घुमा-फिरा के पूछते  , रेखा-राधिका  ,अगरवाल-सबरवाल के क्या हाल हैं ?
मै सब के बारे में बरी-बारी बता देता  |किसके दो बच्चे  हैं , किसका आदमी बैंक में, किसका बैंकाक में है |
बस उनके मतलब की जानकारी को दबा के कहता , आप जिस के चक्कर में थे ,उसका बहुत दिनों से कुछ पता नहीं चला |मै टच में हूँ ,बताउंगा |मै ज्यादा बात  करने से बच जाता |वो अपनी राह  निकल लेते  |
    एक बार जज साहब  से, किसी दोस्त की पार्टी में मुलाक़ात हो गई , दोस्तों-परिचितों के साथ घिरे गप-शप कर रहे थे , मुझे अनदेखा कर रहे हैं ऐसा मुझे लगा  |सीधे –सीधे आमना –सामना होने पर उसे कहना पडा , और सुशील कैसा है तू? ,मैंने कहा अच्छा हूँ मैंने भी  तात्कालिक पूछ लिया ,तुम कैसे हो ?
मुझसे ‘तुम’ सुनकर, भिन्नाए ,अच्छा हूँ , बोलते हुए ,  वो एक इज्जतदार आदमी की तरह, एक तरफ खिसक लिए.... |
    विकास देशमुख , अब विकास –योजना मंत्री हैं ,मेरे बेटे का इंटर-व्यू आया , घर वालो की जिद के चलते उनसे मिलना हुआ |
हम कई-कई रात कंबाइंड स्टडी में बिताते |कहीं रात  में चाय  पीने निकल जाते तो अक्सर उनकी जेब खाली रहती |
खैर , उनसे मिला | बा-हैसियत उनके स्पेशल मिलने  वालो में मेरा  नाम ,मेरे इस  बयान से  कि मै उनका ख़ास मित्र हूँ ,लिख लिया गया |
किसी ने बताया कि बिना एप्वाइन्टमेन्ट के उनसे मुलाकात कराने पर  मंत्री जी खफा होते हैं और  मना भी  कर रखा है |
यहाँ सब अपने को ख़ास ही बता कर घुसना चाहते हैं |
मुझे बुरा भी ख़ूब लगा |मैंने कहा , मै मोबाइल से बात किए लेता हूँ , बस उनको मोबाइल आन करने को कह दें आप लोगों को कोई परेशानी नहीं होगी |
उनके कार्यकर्ता नर्म हुए |मेरा बुलावा भी आ गया |अन्दर का माहौल मेरे लिए नया था ,कभी यूँ मिलना पडेगा सोचा न था | वो तपाक से मिले , मेरी झिझक को भापते हुए ,तात्कालिक दूसरो को बाहर भेज दिया |बोले , इत्मिनान से कहो ,आज इतने दिनों बाद कैसे आना हुआ ? यू क्यों नहीं करते, हम कल या परसों अपने फार्म –हाउस में मिले. साथ लंच लें |खैर अभी ,ज़रा जल्दी बताओ ,कैसे आना हुआ |उसकी व्यस्तता और मेरे संकोच ने ,बेटे के इंटरव्यू को बीच में लाना उचित नहीं जाना |मैंने कहा , लंच में मिलकर बात कर लेंगे |उसने हाथ मिलाया ,उसके लंच के नाम पर दो दिनों तक मै देर-देर से खाना खाया |बुलावा उधर से आया ही नहीं|
घर वालो को, बेटे के इंटरव्यू निकाल लेने पर ,मेरे बेटे की क़ाबलियत से ज्यादा, मेरे मंत्री के रिश्ते पर विश्वास होता है|
    कभी-कभी दोस्तों की बेदिली से , जब उब सा जाता हूँ तो नरेंद्र –निवास की तरफ रुख कर लेता हूँ |इत्मीनान से अकेले में बीते दिनों को याद कर हम दोनों  ख़ूब हंस –बोल लेते हैं |
हम लोग  किसी भी राज की बात बे-तकल्लुफ पूछ लिया करते हैं |हमारा एक दूसरे के प्रति , अबे-अरे के  संबोधन में अब तक कोई फर्क नहीं आया है|एक दिन मैंने पुछा ,अबे नरेंद्र,  बता तू पंडित कैसे हो गया ?
उसने कहा –यार क्या करता ग्रेजुएशन के बाद नौकरी के लिए भटका –घुमा ,चप्पल घिसे ,मगर काम नहीं बना |पिताजी के साथ पंडिताई में जाते –जाते काम के लायक कुछ सीख गया , उसी के भरोसे चल रहा है |
पंडित गिरी में सब अंदाज का होता है ,यजमान की सुविधा में मुहूर्त ,यजमान के रिश्तेदारों की सुविधा में सब नेग-नियम,हमलोग  तात्कालिक बना देते हैं और वही सुविधा देने वाला पंडित  सबसे अच्छा पंडित होता है|
पिताजी तो गुजर गए पर उनके गुरु मन्त्र से रोजी –रोटी अच्छे से चल रही है|बाहर  इज्जत ,मान सम्मान भी बहुत है|और चाहिए भी क्या ?
अचानक उसने कहा , बहुत दिन हो गए, यार  , एक-आध पेग लेगा क्या ,दरअसल ,बिना कम्पनी के  लेना जमता  नहीं |वो मेरे जवाब की प्रतीक्षा किए बगैर ,बोतल उठा लाया | हम कालिज के दिनों में खो से गए |फिर एक-एक दोस्त खबर ली, उनको  जी भर के गालियाँ दी, जो चोचले बघारते आजकल बाहर फिरते हैं |
सुशील यादव,
केन्सास सिटी अमेरिका 

२६.१०१२